लखनऊ। अलीगंज स्थित गेमिंग जोन और लाइब्रेरी में हुआ अग्निकाण्ड बेहद दुखद और विचलित करने वाला है, जिसमे 15 कम उम्र के छात्रध्छात्राओ की दर्दनाक मौत हो गई और कई घायल हो गए थे। इस तरह की घटनाएं जहाँ लखनऊ विकास प्राधिकरण की भ्रष्ट एवं लाचार व्यवस्था को उजागर करती हैं वही लखनऊ का मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय भी लखनऊ विकास प्राधिकरण के रास्ते पर चलता नजर आ रहा है। जहाँ पर मानवीय संवेदना और एक आम नागरिक के जीवन से कोई लेना देना ही नहीं।
यदि इस तरह का हादसा लखनऊ के किसी ऐसे निजी अस्पताल में हो जाए, जिसका रजिस्ट्रेशन मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय द्वारा सिर्फ अस्पताल मालिक के एक श्शपथ पत्रश् के भरोसे कर दिया गया हो, तो कानूनन जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट और विधिक प्रावधानों के अनुसार मुख्य चिकित्सा अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकते। हालांकि अस्पताल मालिक आपराधिक रूप से सीधे तौर पर दोषी होगा, लेकिन सीएमओ और उनका विभाग श्प्रशासनिक शिथिलताश् और श्कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाहीश् के दोषी माने जाएंगे।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत किसी भी अस्पताल को स्थाई या अस्थाई रजिस्ट्रेशन देने से पहले बुनियादी मानकों जैसे फायर एनओसी, बिल्डिंग बायलॉज, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का सर्टिफिकेट और डॉक्टर-स्टाफ की उपलब्धता की जांच करना अनिवार्य है। केवल एक शपथ पत्र लेकर बिना भौतिक सत्यापन या बिना वैध दस्तावेजों के रजिस्ट्रेशन जारी करना नियम विरुद्ध है। शपथ पत्र अस्पताल मालिक को बाध्य करता है, लेकिन वह सरकारी अधिकारी को उसकी जांच करने की वैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
जिला स्तर पर क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को लागू करने की जिम्मेदारी जिला स्वास्थ्य प्राधिकारण की होती है, जिसके मुख्य कर्ता-धर्ता ब्डव् होते हैं।
एक्ट की धाराएं स्पष्ट करती हैं कि यदि कोई संस्थान बिना मानकों के चल रहा है, तो प्राधिकरण को उसका रजिस्ट्रेशन रद्द करने, सील करने और जुर्माना लगाने का अधिकार है।यदि नियमों को ताक पर रखकर सिर्फ कागज पर अस्पताल पास किया गया, तो इसे गठजोड़ या पद का दुरुपयोग माना जाएगा।
यदि ऐसा कोई गंभीर हादसा होता है, तो कानून की नजर में दो तरह की जवाबदेही तय होगी।पहली अस्पताल मालिक पर सीधे तौर पर मुकदमा दर्ज होगा क्योंकि उसने झूठा शपथ पत्र दिया और बिना सुरक्षा मानकों के संस्थान चलाया। फर्जी या भ्रामक शपथ पत्र देकर लाइसेंस हासिल करने का मामला दर्ज होगा। शासन स्तर से तत्काल ब्डव् और संबंधित पटल के क्लर्कध्डिप्टी सीएमओ को निलंबित किया जा सकता है। पीड़ितों के परिजन या अदालत के निर्देश पर जांच एजेंसियां जैसे पुलिस या न्यायिक आयोग ब्डव् को ष्लापरवाही से मौत का कारण बननेष् या भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सह-आरोपी बना सकती हैं, क्योंकि उनकी ढील के बिना यह अवैध संचालन संभव नहीं था।
लखनऊ के पुरनिया हादसे जैसी घटनाएं यह चेतावनी हैं कि कागजी खानापूर्ति (जैसे सिर्फ शपथ पत्र ले लेना) इंसानी जान की कीमत पर नहीं की जा सकती। यदि किसी निजी अस्पताल में ऐसा होता है, तो अस्पताल मालिक जेल जाएगा, लेकिन भ्रष्ट या शिथिल प्रशासनिक व्यवस्था के मुखिया होने के नाते मुख्य चिकित्सा अधिकारी भी समान रूप से जनता और कानून के प्रति जवाबदेह होंगे। ऐसे मामलों में कोर्ट अक्सर सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भी एफआईआर (थ्प्त्) का आदेश देते हैं।
वही लखनऊ मुख्य चिकित्साधिकारी नरेन्द्र बहादुर सिंह इस एक्ट को नहीं मानते। उनसे जब अस्पतालो की फायर एनओसी के बारे मे प्रश्न किया गया तो उन्होंने कहा हमारा डिपार्टमेंट सिर्फ डॉक्टर की डिग्री को देखकर रजिस्ट्रेशन कर देता है।फायर एनओसी के लिए अग्नि शमन विभाग है, वे अस्पतालो से फायर एनओसी लेने के लिए कहे, यह हमारा काम नहीं है, उल्टा पत्रकारों से ही सरकारी गजट मांगते है। सबसे महत्तवपूर्ण रोचक बात यह है कि प्रदेश के अन्य जिलों के सीऍमओ अस्पतालो के रजिस्ट्रेशनध् रिन्यूअल के लिए फायर एनओसी को अनिवार्य मानते है। सवाल यह है आखिर एक ही एक्ट जिसको अन्य जिलों के सीएमओ फॉलो करते है वही लखनऊ सीएमओ इसको तरजी देना भी उचित नहीं समझते। क्या लखनऊ सीएमओ का यह रवैय्या क्या जनता के जीवन से बड़ा है।शायद लखनऊ सीएमओ का यह बयान हादसों को दावत देने के लिए पर्याप्त है।
