लखनऊ। लखनऊ मंडल की मंडलायुक्त (कमिश्नर) के सख्त तेवरों के बाद भी जलकल विभाग में ढर्रा सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले दिनों मंडलायुक्त ने जलकल विभाग का औचक निरीक्षण किया था, जहां अधिकारियों और कर्मचारियों की मनमानी, भारी अनियमितताएं और ढेरों कमियां उजागर हुई थीं। कमिश्नर की इस गहरी नाराजगी के बाद आनन-फानन में प्रशासनिक सुधार कार्यालय के निरीक्षकध्पर्यवेक्षक बालकृष्ण रावत को तैनात किया गया।
उन्हें 18 जून 2026 से 22 जून 2026 तक जलकल मुख्यालय समेत सभी जोनों का सघन पर्यवेक्षण कर रिपोर्ट सौंपनी थी। लेकिन दो दिन बीत जाने के बाद भी नतीजा श्ढाक के तीन पातश् जैसा ही नजर आ रहा है। चर्चा है कि पर्यवेक्षक महोदय विभाग की वास्तविक कमियां ढूंढने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं और अब बैरंग लौटने की तैयारी में हैं।
हैरानी की बात यह है कि कमिश्नर द्वारा भेजी गई उच्च स्तरीय पर्यवेक्षक टीम जलकल विभाग के भीतर सिर्फ सेवा पुस्तिका (सर्विस बुक), साफ-सफाई और गमलों की गिनती तक ही सीमित रह गई है। जैसे ही पर्यवेक्षण कार्यक्रम लागू हुआ, जलकल का लेखा अनुभाग (अकाउंट सेक्शन) रातों-रात ढेरों गमले सजाकर श्उद्यान विभागश् जैसा नजर आने लगा। वहीं दूसरी ओर, कार्यालय की मेजों पर महीनों से धूल फांक रही महत्वपूर्ण फाइलें पल भर में गायब कर दी गईं।बड़ा सवाल यह है कि जलकल महाप्रबंधक कुलदीप सिंह अपनी मनमर्जी से खुद ही मुख्यालय और जोनों का निरीक्षण कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जलकल प्रशासन अब जिला प्रशासन के इकबाल पर भी भारी पड़ रहा है?
ज्ञात हो उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव जितेंद्र कुमार द्वारा 4 अक्टूबर 2021 को जारी शासनादेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि कार्यालयों के निरीक्षण के दौरान बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर बिंदुओं पर गहनता से जांच की जाए। लेकिन जलकल में तैनात पर्यवेक्षक इन मुख्य बिंदुओं पर हाथ डालने से कतरा रहे हैं जैसे ऑडिट आपत्तियों का निस्तारण, जी.पी.एफ (ळच्थ्) लेखा, एन.वी.एस. (छटै) जमा की स्थिति और प्रतिभूति जमा की स्थिति,गबन के प्रकरणों की वर्तमान स्थिति, जन सामान्य से मिले पत्र, आरटीआई (त्ज्प्), जनसुनवाई और ऑनलाइन शिकायतों के निस्तारण का हाल, भूमि-भवन की स्थिति और जलकल की कुल संपत्ति का वास्तविक ब्यौरा, अभिलेख (रिकॉर्ड) प्रबंधन, कार्यालय प्रबंधन, कर्मचारियों की उपस्थितिध्बायोमेट्रिक और मानव संपदा पोर्टल की स्थिति तथा पूर्व में हुए निरीक्षणों की अनुपालन आख्या, प्राप्त व प्रेषित पत्रों का समयबद्ध निस्तारण और वाहनों व लॉगबुक की स्थिति।
आखिर सरकारी आदेश के इन गंभीर बिंदुओं पर पर्यवेक्षक टीम जानकारी जुटाने से क्यों बच रही है? जलकल विभाग की कार्यप्रणाली पर गोपनीयता का ऐसा पर्दा डाला गया है कि मुख्यालय किसी अभेद किले में तब्दील हो चुका है। महाप्रबंधक कुलदीप सिंह आखिर पर्यवेक्षक टीम से मीडियाकर्मियों को दूर क्यों रख रहे हैं?
जिस तरह महाकवि कालिदास ने श्अपनोंश् से दूरी बना ली थी, ठीक उसी तर्ज पर महाप्रबंधक ने बाहरी लोगों और मीडिया के प्रवेश पर अघोषित पाबंदी लगा दी है। यदि विभाग में सब कुछ पारदर्शी है, तो आखिर किस बात का डर है और मीडिया से क्या छुपाने की कोशिश की जा रही है? यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक सुधारों के दावों की पोल खोल रहा है।
