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विशेष राजनैतिक विश्लेषण: सवर्णों की बेरुखी, PDA की घेराबंदी और अति-पिछड़ों का बढ़ता जातिगत प्रेम; 2027 के चक्रव्यूह में कौन मारेगा बाजी?

 


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात जैसे-जैसे बिछने लगी है, सूबे का सियासी पारा अपने चरम पर पहुंच रहा है। राम मंदिर निर्माण जैसे बड़े कोर मुद्दों के धरातल पर उतरने के बाद, अब राज्य की राजनीति पूरी तरह से 'सोशल इंजीनियरिंग' और जातीय समीकरणों के अखाड़े में तब्दील हो चुकी है। यह साफ हो चुका है कि धारणा (Perception) बनाने के लिए चाहे जो नैरेटिव तय किया जाए, लेकिन लखनऊ की गद्दी का फैसला वोट बैंक की जमीनी हकीकत ही करेगी। वर्तमान परिदृश्य में जब भाजपा के पारंपरिक अगड़े और वैश्य मतदाता अपनी ही तरह की चुनौतियों और उदासीनता से घिरे हैं, तब सूबे की पूरी सियासत अति-पिछड़ों और दलित मतों के इर्द-गिर्द सिमट गई है। इस बार भाजपा के पास जहां केशव प्रसाद मौर्य को आगे करने का एकमात्र अचूक हथियार बचा है, वहीं अति-पिछड़ी जातियों को टिकट वितरण में जनसंख्या अनुपात की हिस्सेदारी देने की रणनीति बनाकर ही उत्तर प्रदेश का किला ध्वस्त होने से रोका जा सकता है। वैसे भी पूर्व के चुनावों में जो सैकड़ों नई-नई जातिगत पार्टियां कहीं चुनाव में टिकती नहीं थीं, आज वे अपने लीडर के नेतृत्व में मजबूती के साथ खड़ी हो रही हैं, जो चाहे कुछ सीटें जीतें या हारें, लेकिन उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों के आंकड़े बिगाड़कर बड़ी पार्टियों के सपने चकनाचूर करने का दम रखती हैं।

​उत्तर प्रदेश की सत्ता का इतिहास गवाह है कि साल 2017 में भाजपा को मिला प्रचंड बहुमत सिर्फ मोदी ब्रांडिंग या सत्ता विरोधी लहर का नतीजा नहीं था, बल्कि उसके पीछे गैर-यादव ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) मतदाताओं की वह बड़ी लामबंदी थी, जो केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहती थी। साल 2022 के चुनाव में जब समाजवादी पार्टी की लहर की चर्चाएं आम थीं, तब केशव प्रसाद मौर्य ने अपनी सीट (सिराथू) को दांव पर लगाकर पूरे प्रदेश में रैलियां कीं। वह खुद चुनाव हार गए, लेकिन भाजपा को पूर्ण बहुमत दिला ले गए। आज 2027 के मुहाने पर खड़ी भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसके कोर वोटर कहे जाने वाले सवर्ण (ब्राह्मण-ठाकुर) प्रशासनिक उपेक्षा और स्थानीय अंतर्विरोधों के कारण पूरी तरह भरोसे में नहीं दिख रहे हैं, वहीं पारंपरिक रीढ़ माना जाने वाला वैश्य (व्यापारी वर्ग) मतदान के दिन बूथ पर उतनी सक्रियता नहीं दिखा रहा। ऐसे में 40% से अधिक आबादी रखने वाला गैर-यादव ओबीसी और अति-पिछड़ा वर्ग ही भाजपा की सत्ता में वापसी का इकलौता स्थाई रास्ता है। हालांकि, भाजपा ने सांगठनिक कमान सौंपकर संतुलन बनाने की कोशिश की है, लेकिन जानकार मानते हैं कि चुनाव से पहले केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना या सत्ता का बड़ा 'पावर शिफ्ट' दिखाना ही एकमात्र ऐसा हथियार है जो सपा को दोबारा पछाड़ सकता है। वरना, हिस्सेदारी न मिलने पर अति-पिछड़ों का यही जातिगत प्रेम 2027 में भाजपा का बंटाधार कर देगा।

​दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी का नया सियासी हथियार 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) सीधे तौर पर भाजपा के इसी 40% अति-पिछड़े और गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को निशाना बना रहा है। अखिलेश यादव लगातार इस बात को हवा दे रहे हैं कि भाजपा केवल पिछड़ों का वोट लेती है, लेकिन नेतृत्व उन्हें नहीं सौंपती। मुस्लिम-यादव (MY) के मजबूत कोर बेस के साथ अगर सपा इस 'PDA' फॉर्मूले के जरिए गैर-यादव पिछड़ों और दलितों के एक हिस्से को भी अपने पाले में लाने में कामयाब हो जाती है, तो भाजपा का किला ढहना तय है। वहीं उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के केंद्र में रही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज एक बड़े वैचारिक और रणनीतिक शून्य से गुजर रही है। कोर दलित वोटर खुद को नेतृत्वविहीन पाकर विकल्प तलाशने के मूड में दिखाई दे रहा है। बसपा के इसी बिखराव के बीच भीम आर्मी और आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद को दलित युवाओं के बीच एक नए चेहरे के रूप में देखा गया, लेकिन चंद्रशेखर मुख्य मुकाबले (Fighter Line) से काफी दूर नजर आते हैं। उनकी रैलियों का 'हुड़दंग' आम व गंभीर साइलेंट वोटर को दूर कर देता है और रैली की भीड़ का वोट में न बदल पाना उनकी साख के संकट को दर्शाता है।

​इसी सियासी उठापटक के बीच 'वोट हमारा, राज हमारा' के नारे के साथ अति-पिछड़े और अति-दलित समाज ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है। इन समाजों का साफ कहना है कि "वोट तुम्हारा, राज हमारा का पुराना रवैया अब नहीं चलेगा।" जमीन पर जातिगत स्वाभिमान को लेकर कई दल अपने-अपने समाज में मजबूत पकड़ बना चुके हैं, जिनमें सबका दल यूनाइटेड (प्रमोद लोधी) लोधी समाज में हजारों की भीड़ के साथ दर्जनों रैली कर चुके हैं, वीर फूलन देवी जन संगठन (राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश मल्लाह) मल्लाह समाज में मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब हो रहे हैं, वहीं राष्ट्रीय उदय पार्टी (बाबूराम पाल) पाल और गड़रिया समाज में, जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनेश ठाकुर कर्पूरी सैन, सविता और नंद समाज में राजनीतिक हिस्सेदारी की चेतना जगाने में न सिर्फ कामयाब हुए हैं बल्कि वो दर्जनों रैलियां हैलीकॉप्टर व कारों द्वारा करके अपने ओजस्वी भाषण से कई अन्य अति-पिछड़ी जातियों में भी गहरी पैठ बना चुके हैं। स्वतंत्र जनता राज पार्टी (घनश्याम कोरी) कोरी समाज में, पार्टिकल जस्टिस पार्टी (राजेश सिद्धार्थ वाल्मीकि) वाल्मीकि समाज में, राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (स्वामी प्रसाद मौर्य) मौर्य समाज में इस बार तेजी से पैठ बनाते नजर आ रहे हैं और उनके पीछे जुटी भीड़ उनकी वास्तविकता बताने को काफी है। वहीं लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (पूर्व सांसद राजकुमार सैनी) सैनी समाज में इस बार मजबूती से नेतृत्व करते दिखाई पड़ रहे हैं, महान दल के केशव देव मौर्य ने भी सैनी समाज में तेजी से पैर पसारे हैं और रिटायर आईएएस टी. प्रसाद व डॉ. शिवप्रकाश विश्वकर्मा की सम्यक पार्टी शाक्य व बढ़ई समाज में मजबूती से सक्रिय हैं। इनके अलावा बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी, नलिन चौधरी की युवा सत्ता पार्टी, गोपाल कुशवाहा की राष्ट्रीय समानता दल और साहब सिंह धनगर की शोषित समाज पार्टी भी तेजी से अपने-अपने समाजों को लामबंद कर रही हैं।

​राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि इन सभी जातियों के वोटों को जोड़ दिया जाए, तो प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में इनका कुल वोट 1 लाख से अधिक बैठता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कोई भी ऐसी जाति नहीं है जिसका किसी भी विधानसभा सीट पर 10 हजार से कम वोट हो। चूंकि यह पूरा वोट बैंक पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर रहा है, इसलिए यदि यह धड़ा छिटकता है, तो भाजपा को "जोर का झटका धीरे से" लग सकता है। इन छोटे दलों के रणनीतिकारों का रुख बेहद आक्रामक है; उनका स्पष्ट कहना है कि भले ही वे 2027 में अपने दम पर विधायक न बना पाएं, लेकिन वे अपनी-अपनी जातियों के प्रत्याशी उतारकर बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के समीकरणों को ध्वस्त करने (खेल में डंडा मारने) की पूरी गारंटी रखते हैं। सूत्रों के मुताबिक, सपा मुखिया अखिलेश यादव की नजर इन सभी छोटे जातिगत दलों पर बनी हुई है, लेकिन इन दलों के भीतर एक बड़ा संशय भी है। इन दर्जनों पार्टियों के नेताओं का आरोप है कि अतीत में वे सपा से धोखा खा चुके हैं और समाजवादी नेताओं में आगे बढ़ते अति-पिछड़ों और अति-दलितों को लेकर ईर्ष्या का भाव जगजाहिर है। अब यह पूरा खेल केवल संबंधों और व्यवहार कुशलता के बल पर भाजपा केशव प्रसाद मौर्य के सहारे खेल सकती है, जो इन तेजी से बढ़ते जातिगत फ्रेमों को एक मंच पर लाने की क्षमता रखते हैं। यह 16 आने सच है कि उत्तर प्रदेश में जातिगत प्रेम बहुत तेजी से बढ़ा है। यदि इन छोटी पार्टियों ने आपस में गठबंधन करके चुनाव लड़ा, तो वे चुनाव हारें या जीतें, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठने का ख्वाब देखने वाले बड़े-बड़ों के सपने चकनाचूर जरूर कर देंगे। 2027 की सियासी बिसात बिछ चुकी है, अब देखना यह है कि ऊँट किस करवट बैठता है।

बसपा ने खेल दिया खेल तो चंद्रशेखर हो जाएंगे फेल

2027 चुनाव को लेकर बसपा जहां चुनावी बिसात बिछाने में सबसे पीछे है वहीं चंद्रशेखर भी दलित वोटों में बिखराव करते दिखाई देने लगे हैं उनके अंदर जहां राजनीति का जूनून साफ देखा जा सकता है वहीं अपरिपक्वता की चर्चा न सिर्फ बहुजन मिशन में लगे लोगों में देखी जा सकती है तो मीडिया में भी उनकी अपरिपक्वता की चर्चाएं रहती है ऐसी स्थिति में यदि बसपा अतिपिछड़ी जातियों पर शोसल इंजिनियरिंग करके नहीं काशीराम जी की जन संख्या अनुपात में हिस्सेदारी देने का मन बना लेती है तो अकेली सपा भाजपा कांग्रेस को मात देने का बल रखती है और आधी से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बना सकती है उनके सलाहकार भी उनके बड़े दिल को छोटा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते जिस कारण उन्हें भय रहता है कि किसी जाति में नेतृत्व पैदा कर उसे ताकतवर न बनाया जाए, बस यही भय उन्हें आज अर्श से फर्श तक लें पहुंचा है फिर भी आज तक  दलित मतदाताओं में बसपा सुप्रीमो का जादू सिर चढ़कर बोलता है कुल मिलाकर चंद्रशेखर आजाद को जहां मुस्लिम मतदाताओं को लेकर गलतफहमी बताई जाती है वहीं अतिपिछड़ी जातियों में पकड़ न बना पाना उनके आगामी चुनाव में चमत्कार न दिखा पाने का मुख्य कारण हों सकता है हालांकि चंद्रशेखर दलित  वंचित जातियों का उभरता हुआ चेहरा बनने लगा था जिसे उनके सिपहसालार ही ध्वस्त करने में जुटे हैं और उन्हें दो चार भीड़ जुटाकर न सिर्फ मुख्यमंत्री बल्कि देश का प्रधानमंत्री बनाने में माहिर हो चुकें हैं खैर दलित राजनीति में कौन अपनी पैठ बनाने में कामयाब रहता है फिलहाल तो इन दोनो के बीच इसको लेकर रेस लगाई जा रही है

विश्लेषक विधान केसरी अखबार के प्रमुख सम्पादक है

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