विशेष ब्यूरो, लखनऊ! देश की राजनीति में इन दिनों अतीत की गलतियों और वर्तमान की प्रशासनिक लाचारी को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां मुख्यधारा की राजनीति में इस बात को लेकर तीखा आक्रोश है कि कांग्रेस के अतीत के ढुलमुल रवैये के कारण आज देश को ध्रुवीकरण की राजनीति देखनी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर प्रशासनिक ढिलाई का फायदा उठाकर हजारों करोड़ रुपये का 'डग्गामार सिंडिकेट' सरकार और राजस्व को चूना लगा रहा है।
व्यवस्था की इस दोहरी विफलता पर एक विशेष खोजी रिपोर्ट:
राजनैतिक विमर्श: 'समय रहते कड़े कदम न उठाने का खामियाजा'
राजनैतिक विश्लेषकों और सजग नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि आज देश में जो राजनैतिक परिदृश्य है, उसकी नींव अतीत की कमियों में छिपी है। तीखे शब्दों में कहा जाए तो, यदि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में सख्त और निर्णायक फैसले लिए होते, तो आज विपक्ष को यह दिन न देखना पड़ता।
आरोप है कि तत्कालीन सरकारों ने देश को बांटने वाली और अराजकता फैलाने वाली ताकतों—चाहे वह आरएसएस (RSS), बजरंग दल हो या विश्व हिंदू परिषद (VHP)—के खिलाफ समय रहते सख्त और कानूनी कार्रवाई नहीं की। इस राजनैतिक ढुलमुलपन और तुष्टीकरण व नरम रुख की राजनीति का ही नतीजा है कि दक्षिणपंथी ताकतें आज सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं। आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि यदि कड़े कानूनी सुधार और सख्त प्रशासनिक कदम उठाए गए होते, तो गंभीर आरोपों से घिरे नेताओं पर समय रहते नकेल कसी जा सकती थी और मतदाता सूचियों से लेकर राजनैतिक शुचिता तक का परिदृश्य आज कुछ और होता।
जमीनी हकीकत: दिल्ली से यूपी तक फैला हजारों करोड़ का 'डग्गामार सिंडिकेट'
राजनैतिक उठापटक से इतर, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित राज्य के तमाम जिलों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक एक ऐसा अवैध सिंडिकेट चल रहा है जो सरकारों के बदलने से भी नहीं बदलता। यह सिंडिकेट है—अवैध डग्गामार बसों का काला कारोबार।
राजस्व की बड़ी चोरी और हादसों को दावत:
अकेले यूपी से हजारों बसें सक्रिय:
सूत्रों के मुताबिक, अकेले उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों और राजधानी लखनऊ से रोजाना सैकड़ों डग्गामार बसें दिल्ली के लिए सफर तय करती हैं।
सालाना हजारों करोड़ का सिंडिकेट:
यह पूरा खेल परिवहन विभाग और स्थानीय तंत्र की नाक के नीचे चलता है। टैक्स और परमिट की चोरी के जरिए यह सिंडिकेट सालाना हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान सरकारी खजाने को पहुंचा रहा है।
सवारी और माल दोनों पर कब्जा:
इन बसों में न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर सवारियां ठंसी जाती हैं, बल्कि छोटे कारोबारियों का टैक्स चोरी का माल भी दिल्ली से धड़ल्ले से लाया जाता है। यह पूरा माल बस के कंडक्टर की जिम्मेदारी पर बिना किसी बिल या कागजात के 'मैनेज' होकर आता है।
मंत्री बदलते हैं, सिंडिकेट नहीं:
इस अवैध धंधे में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। अतीत में कई बड़े हादसे हो चुके हैं, जिनमें डग्गामार बसें धू-धू कर जल चुकी हैं और कई मासूमों की जान गई है। इसके बावजूद कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। आम जनता और परिवहन कर्मियों का कहना है कि सूबे में सरकारें बदलती हैं, परिवहन मंत्री बदलते हैं, लेकिन यह सिंडिकेट टस से मस नहीं होता। हर कोई दबी जुबान में स्वीकार करता है कि इन डग्गामारों को 'ऊपर' बैठे रसूखदारों और मंत्रियों का सीधा संरक्षण प्राप्त है, जो इसे अपना अधिकार मानकर तंत्र को पंगु बनाए हुए हैं।
निष्कर्ष
चाहे बात देश की राजनैतिक दशा की हो या सड़कों पर दौड़ते इस अवैध आर्थिक सिंडिकेट की, दोनों ही जगह एक ही समानता नजर आती है—समय रहते सख्त और ईमानदार कार्रवाई का अभाव। जब तक तंत्र अपने निहित स्वार्थों को छोड़कर अराजक तत्वों और अवैध सिंडिकेट्स के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति नहीं अपनाएगा, तब तक न तो राजनैतिक शुचिता आएगी और न ही सरकारी राजस्व और जनता की जान सुरक्षित रह पाएगी।
