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कर्ज माफ या रिकार्ड साफ!​लाखों करोड़ की 'कर्ज माफ़ी' या बैंकिंग प्रक्रिया?, जानिए लोन राइट-ऑफ़ और बड़े कॉरपोरेट्स का पूरा सच ​

 


विशेष ब्यूरो

नई दिल्ली!​पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में देश के बड़े पूंजीपतियों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज माफ़ करने को लेकर बहस छिड़ी हुई है। भ्रामक विज्ञापनों और इंटरनेट पर तैरतीं फर्जी खबरों (Fake News) के बीच आम जनता में यह धारणा बन रही है कि सरकार या बैंकों ने बड़े उद्योगपतियों का कर्ज पूरी तरह माफ़ (Loan Waiver) कर दिया है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? बैंकिंग नियमों, संसद के आंकड़ों और देश के बड़े डिफ़ॉल्टर्स की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करती हमारी विशेष रिपोर्ट:

​क्या है हकीकत: 

लोन 'वेवर' और 'राइट-ऑफ़' का अंतर

​बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार, आम जनता जिसे 'कर्ज माफ़ी' समझ रही है, वह तकनीकी रूप से 'लोन राइट-ऑफ़' (बट्टा खाते में डालना) है। जब कोई लोन लंबे समय तक वापस नहीं आता और एनपीए (NPA) बन जाता है, तो रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के तहत बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ रखने के लिए उसे राइट-ऑफ़ कर देते हैं। इसका मतलब कर्ज माफ़ी बिल्कुल नहीं होता; बैंक डिफ़ॉल्टर्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, संपत्ति की नीलामी और दिवालिया प्रक्रिया (NCLT) के जरिए वसूली जारी रखते हैं।

​संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पिछले एक दशक में भारतीय कमर्शियल बैंकों ने करीब ₹10 लाख करोड़ से अधिक के लोन राइट-ऑफ़ किए हैं, जिनमें एक बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट सेक्टर्स का था। हालांकि, इनमें से वास्तविक वसूली (Recovery Rate) केवल 15% से 28% के बीच होना अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चिंता का विषय जरूर है।

हाई-प्रोफाइल मामलों की वास्तविक स्थिति:

देश के चार बड़े चर्चित नामों को लेकर अक्सर लोन माफ़ी के दावे किए जाते हैं, जिनकी जमीनी हकीकत इस प्रकार है:

नीरव मोदी (भगोड़ा घोषित): पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के ₹14,000 करोड़ के घोटाले के मुख्य आरोपी नीरव मोदी की कंपनियों के करीब ₹7,800 करोड़ के मूल लोन को बैंकों ने टेक्निकल राइट-ऑफ़ किया है। लेकिन यहाँ कोई माफ़ी नहीं हुई है; प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा देश-विदेश में उसकी संपत्तियां जब्त की गई हैं और उन्हें बेचकर बैंकों ने अब तक हजारों करोड़ रुपये की वसूली की है।

अनिल अंबानी (रिलायंस ADAG): अनिल अंबानी की कंपनियां (आरकॉम, रिलायंस कैपिटल आदि) भारी घाटे के कारण दिवालिया हो गईं। बैंकों का इन पर करीब ₹48,000 करोड़ से अधिक का बकाया था। कंपनियां डूबने के कारण बैंकों को बड़ा हिस्सा राइट-ऑफ़ करना पड़ा। अब कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी (IBC) के तहत इन कंपनियों के एसेट्स को बेचकर जो भी रिकवरी हो रही है, उसे बैंक ले रहे हैं, जिसमें बैंकों को भारी नुकसान (Haircut) उठाना पड़ा है।

सुभाष चंद्रा (एस्सेल ग्रुप): ज़ी एंटरटेनमेंट के प्रमोटर सुभाष चंद्रा पर करीब ₹11,000 करोड़ का कर्ज संकट आया था। हालांकि, उन्होंने भगोड़ा बनने के बजाय अपनी कंपनियों के शेयर और निजी संपत्तियां बेचकर लगभग 91% से अधिक का कर्ज खुद चुकाया। कुछ बचे हुए खातों में बैंकों ने आपसी समझौते (Setttlement) के तहत आंशिक नुकसान उठाया।

गौतम अडाणी (अडाणी ग्रुप): सोशल मीडिया के दावों के विपरीत, अडाणी ग्रुप का कोई भी लोन अकाउंट 'NPA' या 'Right-off' नहीं हुआ है। बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए ग्रुप पर बड़ा कर्ज जरूर है, लेकिन ग्रुप एक 'स्टैंडर्ड अकाउंट' की तरह अपने सभी लोन और ब्याज की किस्तें समय पर चुका रहा है।

निष्कर्ष: अफवाहों से बचें

​इस पूरे विश्लेषण से साफ है कि बैंकों द्वारा डूबे कर्ज को खाते से हटाना (Write-off) एक नियमित बैंकिंग प्रक्रिया है, न कि किसी उद्योगपति को दिया गया कोई विशेष उपहार या 'लोन वेवर'। आम जनता को सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले भ्रामक दावों और एडिट की गई तस्वीरों के बजाय आधिकारिक बैंकिंग आंकड़ों पर ही भरोसा करना चाहिए।

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