बदलते परिवेश में आज देश के भीतर प्रत्येक वर्ष बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती और परिनिर्वाण दिवस बड़े पैमाने पर मनाए जाने की परंपरा तेजी पकड़ चुकी है। इन विशेष अवसरों पर जहाँ समाज में एक तरफ सकारात्मक सोच और गहरी वैचारिक चेतना नजर आती है, वहीं दूसरी तरफ राजनेताओं में वोट झटकने का लालच भी साफ शब्दों में देखा जा सकता है।
बीते कई दशकों में बाबासाहेब को याद करने और उनके नाम पर राजनीति करने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह हर वर्ष तेजी पकड़ता गया। देखते ही देखते एक दौर ऐसा भी आया जब बाबासाहेब के विचारों को अपशब्द कहने वाले भी केवल 'वोट' के गणित के चक्कर में उनकी तस्वीर गले में डालकर घूमने लगे। कल तक जो राम-राम, नमस्कार या सलाम-वालेकुम करते थे, वे आज राजनीतिक मजबूरी में ही सही, 'जय भीम' करते नजर आ रहे हैं।
परंतु, सबसे बड़ा और कड़वा अनुत्तरित प्रश्न यह है कि बाबासाहेब के लिखे संविधान की बदौलत संसद तक पहुँचने वाले अनुसूचित और पिछड़ी जातियों के सैकड़ों सांसद और नेता उनके संविधान की मूल भावना की रक्षा क्यों नहीं कर सकें? शर्म की बात तो यह है कि आज कोई भी दलित या पिछड़ा राजनेता खुले शब्दों में यह स्वीकार करने का साहस नहीं दिखा पा रहा है कि वह बाबासाहेब के नाम को सत्ता पाने का केवल एक हथियार समझकर छलावा कर रहा है, या उनके बताए रास्ते की अनदेखी करके महज़ उनका प्रेमी होने का दिखावा कर रहा है।
मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि बाबासाहेब के नाम पर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने वाले दलों ने दिल से उनकी बातों और सिद्धांतों को माना होता, तो आज भारत की सरकार ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के मीडिया, न्यायपालिका, कार्यपालिका और बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों में बाबासाहेब के अनुयायियों की मजबूत और निर्णायक हिस्सेदारी किसी से छिपाए नहीं छिपती।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो हम पाते हैं कि बाबासाहेब खुद लंबे समय तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सीधे जुड़े रहे और उन्होंने स्वयं संपादन का कार्य किया। जब-जब उन्हें मौका मिला, वे अपने शुभचिंतकों को मीडिया के महत्व और उसकी ताकत को समझाना नहीं भूले। उनके विभिन्न लेखों में इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि उन्होंने अपने जमाने के मुख्यधारा के मीडिया पर दलितों और वंचितों की घोर अनदेखी करने का सीधा आरोप लगाया था। बाबासाहेब ने चेताया था कि दलित समाज के लोग जागरूक और संपन्न होने के बाद भी यदि अपनी बात मजबूती से रखने वाला अपना खुद का मीडिया तंत्र तैयार नहीं कर सके, तो यह इस शोषित समाज के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होगा।
मैं यह भी पूरी दृढ़ता के साथ कह सकता हूँ कि बाबासाहेब का नाम लेकर कुमारी मायावती हों, मुलायम सिंह यादव हों, रामविलास पासवान या रामदास अठावले सहित तमाम नेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं और सत्ता हासिल की, लेकिन इनमें से कोई भी बाबासाहेब के उस सपने को साकार नहीं कर सका जिसमें एक मजबूत 'वंचित मीडिया' तैयार करने की बात कही गई थी। यही हाल भाजपा का भी है, जो बाबासाहेब का नाम लेकर केंद्र की सत्ता पर काबिज तो है और खुद को आरक्षित व शोषित वर्ग का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध करने का दंभ भरती है, परंतु दूरदर्शन पर रामायण, महाभारत सहित तमाम धारावाहिक दिखाने वाला यह तंत्र डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित संविधान के निर्माण की गाथा या उनके संघर्षों पर कोई भव्य फिल्म या श्रृंखला देश को नहीं दिखा सका।
मजेदार बात तो यह है कि इस बात की मांग खुद को बड़ा सामाजिक संगठन मानने वाले और तथाकथित दलित नेताओं ने भी कभी प्रमुखता से नहीं की। हालांकि, आरक्षित वर्ग के वे पुराने नेता और कार्यकर्ता निश्चित रूप से सराहना के पात्र हैं जिन्होंने न सिर्फ छोटे-छोटे पक्षपाती मीडिया घरानों को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि आरक्षण और गरीब वर्ग के प्रति पूर्वाग्रह रखने वाले बड़े-बड़े मीडिया घरानों को भी बेनकाब किया। एक दौर वह भी था जब मान्यवर कांशीराम जी ने जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त एक मीडियाकर्मी को ऐसा कड़ा सबक सिखाया था कि उसने लंबे समय तक भेदभाव की पत्रकारिता करने की हिम्मत नहीं की।
बाबासाहेब ने उस दौर में भारत में सबसे उच्च शैक्षिक योग्यता रखने के बावजूद मीडिया की ताकत को गहराई से समझा था। उन्होंने कई मौकों पर खुले शब्दों में तत्कालीन मीडिया की निंदा करते हुए उसे 'मनुवादी मीडिया' कहा था, जो कभी दलितों की आवाज नहीं बन सकता और हमेशा उनकी आलोचना में लगा रहता है। बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था कि इस आलोचना का उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
उनके समय का इतिहास गवाह है कि डॉक्टर आंबेडकर को तभी यह समझ आ गया था कि देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो और संचार के साधनों पर एक विशेष वर्ग का एकाधिकार है। इसलिए जो लड़ाई वे लड़ रहे हैं, उसमें मुख्यधारा का मीडिया (मेनस्ट्रीम मीडिया) उनके लिए सहयोगी नहीं, बल्कि प्रतिरोध का कारण बनेगा। इसी दूरदर्शिता के कारण उन्होंने स्वयं 'मूकनायक', 'बहिष्कृत भारत' और 'प्रबुद्ध भारत' जैसे क्रांतिकारी समाचार पत्र निकाले और उनके संपादन व लेखन का कार्यभार खुद संभाला। डॉ. आंबेडकर ने अपने पूरे सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को मीडिया की धार देकर ही आगे बढ़ाया और अछूतों के मानवाधिकारों की आवाज को बुलंद किया।
कहा जाता है कि जब बाबासाहेब ने अपनी पहली पत्रिका 'मूकनायक' प्रकाशित की, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने 'केसरी' नामक समाचार पत्र में 'मूकनायक' का विज्ञापन तक छापने से साफ इनकार कर दिया था। इस घोर असहयोग के बावजूद बाबासाहेब झुके नहीं और उन्होंने अपने सीमित साधनों से सामाजिक न्याय की वह वैचारिक लड़ाई लड़ी, जिसका सीधा लाभ आज भारत का प्रत्येक दलित और पिछड़ा वर्ग का मतदाता ले रहा है।
साल 1945 में जब 'ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन' ने अपने साप्ताहिक मुखपत्र 'पीपल्स हेराल्ड' की शुरुआत की, तो इस पत्र का मुख्य उद्देश्य अछूतों की आकांक्षाओं, मांगों और शिकायतों को स्वर देना था। इस पत्र के उद्घाटनकर्ता की हैसियत से बोलते हुए डॉक्टर आंबेडकर ने जो कहा था, वह आज के दौर में भी सबसे बड़ा कड़वा सच है। उन्होंने कहा था:
"आधुनिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में एक अच्छी सरकार के लिए निष्पक्ष समाचार पत्र ही मूल आधार है। इसलिए भारत के अनुसूचित जाति के अतुलनीय दुर्भाग्य और दुर्दशा को तब तक समाप्त नहीं किया जा सकता, जब तक हम खुद के स्वामित्व वाले छोटे-बड़े समाचार पत्रों का प्रकाशन न करें और अपने लोगों को शिक्षित न करें।"
बाबासाहेब चाहते थे कि यह समाचार पत्र जन-प्रतिनिधियों (विधायकों-सांसदों) के व्यवहार और उनकी कार्यशैली पर जनता के सामने रिपोर्टिंग करे और जनता से कहे कि वे अपने प्रतिनिधियों से पूछें कि 'ऐसा क्यों है?' उनका मानना था कि जब जनता सवाल पूछेगी, तो जन-प्रतिनिधियों के व्यवहार और जवाबदेही में बहुत बड़ी तब्दीली आएगी। उन्होंने कहा था कि इस व्यवस्था के माध्यम से शोषित समुदाय पर होने वाले अन्यायों को रोका जा सकता है और वे इस समाचार पत्र को एक ऐसे माध्यम के रूप में देखते हैं जो गलत दिशा में भटके हुए लोगों का शुद्धिकरण कर सकता है।
गौर करने वाली बात यह है कि समाचार पत्र और पत्रिकाएं निकालने का यह वैचारिक दौर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी के समय तक तो कुछ हद तक चला। उन्होंने भी अपने आंदोलन की जमीनी शुरुआत 'बहुजन संगठक' नामक समाचार पत्र से करके अपने क्रांतिकारी विचारों को देश और दुनिया में फैलाया था। परंतु उनके बाद, बाबासाहेब के नाम पर सत्ता हासिल करने वाले लोग धीरे-धीरे शोषक पूंजीपतियों और व्यवस्था के चंगुल में फंसते चले गए। वे राजनीतिक रैलियां और मिशन की बातें तो करते रहे, लेकिन इस आवश्यक 'मीडिया आंदोलन' को जिंदा नहीं रख सके।
यही मूल कारण है कि आज बाबासाहेब के सपनों को साकार करने का दावा करने वाले सभी राजनीतिक दलों का हश्र सबके सामने है। यह बेहद त्रासद है कि इन नेताओं ने बाबासाहेब के नाम पर आलीशान बंगले और सत्ता सुख तो पा लिया, लेकिन वे बड़े-बड़े मीडिया घराने या मजबूत व्यापारिक प्रतिष्ठान खड़े करके अपने समाज के युवाओं को स्थायी रूप से आजीविका, रोजगार और सम्मानजनक स्थान दिलाने में पूरी तरह नाकाम रहे।
भले ही राजनीतिक स्वार्थ या प्रशासनिक बंदिशों के डर से इन महापुरुषों के आंदोलनों को सार्वजनिक स्थानों पर उस शिद्दत से न चलाया जा रहा हो, लेकिन देश का जागरूक दलित-पिछड़ा और वंचित समुदाय आज उन्हें अपने घरों में एक मसीहा और युगपुरुष की तरह श्रद्धापूर्वक याद करता है और पूजता है। यह चेतना दुनिया में एक नए और जागरूक भारत की स्थापना का शुभ संकेत है।
लेकिन दूसरी तरफ, एक कड़वी हकीकत यह भी है कि सत्ता को नजरअंदाज कर, आरक्षित वर्ग का सबसे बड़ा वोट बैंक रखने वाले लोग आज बिना अपना घर (आर्थिक और मीडिया तंत्र) सुधारे केवल सामाजिक और धार्मिक बदलावों के सतही नारों में उलझे हुए हैं। यह वैचारिक बदलाव जरूरी तो है, लेकिन मजबूत आधार के बिना संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में बहुत देर करने वाला है।
बहरहाल, 'विधान केसरी' परिवार गरीबों, वंचितों और शोषितों के इस महान मसीहा को अपनी सच्ची वैचारिक श्रद्धांजलि अर्पित करता है। इसके साथ ही, हम वोटों की ठेकेदारी करने वाले तथाकथित एजेंटों और राजनेताओं से भी यह कहना चाहते हैं कि बाबासाहेब द्वारा लिखित संविधान में जिस तरह प्रत्येक जाति, वर्ग और धर्म के अधिकारों व सम्मान की वकालत की गई है, उसका पूरी ईमानदारी से ध्यान रखें। उनकी याद में केवल औपचारिक आयोजन करना काफी नहीं है, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना ही उन्हें सच्ची और वास्तविक श्रद्धांजलि होगी।
विनेश ठाकुर
संपादक, विधान केसरी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
