भांवरकोल/गाजीपुर। माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, ममता और संस्कारों का ऐसा अथाह सागर है, जिसकी गहराई को शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं। संसार में यदि किसी रिश्ते को सबसे पवित्र और निस्वार्थ माना गया है, तो वह माँ का रिश्ता है। कहा भी गया है, (माँ से छोटा कोई शब्द नहीं और माँ से बड़ा कोई भगवान नहीं।) यह पंक्ति माँ के महत्व को सहज ही स्पष्ट कर देती है।
भारतीय संस्कृति में माँ को ईश्वर का दूसरा रूप माना गया है। वेदों और शास्त्रों में भी माता के स्थान को सर्वोच्च बताया गया है। (मातृ देवो भवरू) अर्थात माता को देवता समान मानो, यह शिक्षा हमारी संस्कृति की महानता को दर्शाती है।
माँ वह शक्ति है, जो अपने बच्चों के सुख के लिए हर कठिनाई सह लेती है। बच्चे के जन्म से लेकर उसके जीवन के हर मोड़ तक माँ बिना किसी स्वार्थ के उसका मार्गदर्शन करती है। जीवन की पहली सीख, पहला संस्कार और पहला स्नेह हमें माँ से ही प्राप्त होता है। यही कारण है कि माँ को बच्चे का प्रथम गुरु भी कहा जाता है।
माँ का आंचल बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होता है। उसकी ममता में वह ताकत होती है, जो हर दुख और पीड़ा को कम कर देती है। माँ स्वयं कष्ट सहकर भी अपने बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती है। उसका प्रेम कभी कम नहीं होता, बल्कि समय के साथ और गहरा होता जाता है।
आज के आधुनिक दौर में भले ही जीवन की भागदौड़ बढ़ गई हो, लेकिन माँ का महत्व कभी कम नहीं हो सकता। माँ परिवार की वह मजबूत नींव है, जिस पर पूरे घर की खुशियाँ टिकी होती हैं। वास्तव में, माँ का स्थान इस संसार में सबसे ऊँचा और पूजनीय है।

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