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संघ मजबूत होता तो देश का बंटवारा नहीं होता-सुनील आंबेकर


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी कि RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा है कि देश का विभाजन भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक था। उनका मानना है कि यदि उस समय संघ आज की तरह मजबूत होता, तो देश का बंटवारा नहीं होता। नागपुर में आयोजित एक संगोष्ठी में आंबेकर ने कहा कि वर्ष 1947 में संघ उतना मजबूत नहीं था, जितना वह होना चाहता था। इसके बावजूद संघ ने विभाजन के दौरान हिंदुओं की सुरक्षा और उनके पुनर्वास के लिए पूरी ताकत से काम किया था।

आंबेकर ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए अक्सर संघ के बारे में गलत जानकारियां फैलाई जाती हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि संघ किसी से नफरत या दुश्मनी नहीं रखता। संघ समाज के सभी वर्गों को अपना मानता है और सभी के साथ संवाद तथा चर्चा में विश्वास रखता है। इसी कारण संघ हमेशा बातचीत के लिए तैयार रहता है। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले द्वारा पाकिस्तान के साथ संवाद जारी रखने संबंधी बयान पर पूछे गए सवाल के जवाब में आंबेकर ने कहा कि RSS के दृष्टिकोण को गहराई से समझने की जरूरत है।

आंबेकर ने कहा कि संघ हमेशा मानता रहा है कि लोगों के बीच बातचीत और संवाद से जमीनी स्तर पर समस्याओं का समाधान निकलता है, और दत्तात्रेय होसबले ने भी इसी भावना को व्यक्त किया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार-से-सरकार के स्तर पर बातचीत करना पूरी तरह राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णय होता है, जिसे सरकार अपने आकलन और परिस्थितियों के अनुसार तय करती है। RSS इस विषय पर सरकार को तत्काल कोई सलाह नहीं देता। उन्होंने कहा कि बातचीत से रिश्तों में निरंतरता बनी रहती है और समय के साथ कई समस्याओं के समाधान का रास्ता निकल सकता है।

आजकल कुछ समूहों द्वारा लगाए जा रहे 'जय भीम, लाल सलाम' जैसे नारों पर प्रतिक्रिया देते हुए आंबेकर ने कहा कि जब तक दुनिया में गौतम बुद्ध द्वारा दिखाया गया शांति का मार्ग मौजूद है, तब तक कार्ल मार्क्स या अन्य विचारधाराओं के रास्ते पर चलने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए थे और उनके मूल विचारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

आंबेकर ने कहा कि दुनिया में चल रहे विभिन्न संघर्षों के कारण भारत भी कुछ क्षेत्रों में चुनौतियों और संकटों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में सभी से सहयोग की अपेक्षा होती है। उन्होंने कहा कि देश को दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संवेदनशील और संकट की परिस्थितियों में राजनीतिक लाभ-हानि की सोच नहीं लानी चाहिए, बल्कि राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।

देश में विभिन्न मुद्दों पर युवाओं की भागीदारी और नाराजगी के प्रदर्शन से जुड़े सवालों पर आंबेकर ने कहा कि भारत एक जागरूक और लोकतांत्रिक समाज है। यहां पारदर्शी चुनाव, स्वतंत्र मीडिया, सोशल मीडिया और खुली चर्चा की परंपरा मौजूद है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों का सामने आना और लोगों द्वारा अपनी राय व्यक्त करना कोई असामान्य बात नहीं है। इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाना चाहिए।

आंबेकर ने कहा कि मीडिया स्वतंत्र है, राजनीतिक दल सक्षम हैं और देश की संस्थाएं भी मजबूत हैं। हमारा लोकतांत्रिक तंत्र विभिन्न परिस्थितियों को संभालने में पूरी तरह सक्षम है। इसलिए संघ को हर मुद्दे पर तुरंत हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं होती।

देश की युवा पीढ़ी को लेकर आंबेकर ने कहा कि आज के युवा, जिन्हें अक्सर 'जेन-ज़ी' कहा जाता है, भारत के भविष्य को लेकर बेहद आशावान हैं। उन्हें अपने देश पर पूरा भरोसा है और वे संविधान के दायरे में रहकर देश के विकास में योगदान दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं ने अपनी ऊर्जा और प्रतिभा को राष्ट्र निर्माण में लगाया है। यही कारण है कि देश आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, उद्योग और अन्य क्षेत्रों में लगातार प्रगति कर रहा है। युवा शक्ति ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है और देश की तरक्की में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

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