प्रतापगढ़/बाबागंज।संग्रामगढ़ थाना क्षेत्र में ग्राम प्रधान पर हुए जानलेवा हमले के मामले ने अब और तूल पकड़ लिया है। पीड़ित प्रधान ने पुलिस पर तहरीर बदलवाने, आरोपियों को बचाने और कार्रवाई में लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने ही संगठन पर भी साथ न देने का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें हर स्तर पर निराशा हाथ लग रही है।
बाबागंज ब्लॉक के संग्रामगढ़ थाना क्षेत्र के खनवारी गांव निवासी ग्राम प्रधान सुशील शुक्ल का कहना है कि 6 फरवरी 2026 की शाम वह अपने गांव में एक एससी वर्ग के मजदूर को उसके घर छोड़ने जा रहे थे। इसी दौरान गांव के कुछ दबंग प्रवृत्ति के लोगों ने उन्हें घेर लिया और लाठी-डंडों व लोहे की रॉड से हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। बचाव में दौड़े मजदूर के साथ भी आरोपियों ने मारपीट की।
प्रधान का आरोप है कि घटना के बाद अचेत अवस्था में ही पुलिस ने उनकी तहरीर बदलवा दी और गंभीर धाराओं के बजाय साधारण धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया। वहीं, मजदूर की तहरीर पर भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।
घायल प्रधान का कहना है कि सीएचसी संग्रामगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद भी पुलिस इलाज कराने के लिए उनके साथ प्रयागराज नहीं गई, जिससे उन्हें खुद ही इलाज के लिए प्रयागराज जाना पड़ा। वहां वे करीब दो सप्ताह तक एसआरएन अस्पताल में भर्ती रहे।
सबसे बड़ा आरोप यह है कि घटना के डेढ़ माह बाद भी विवेचक ने न तो घटनास्थल का निरीक्षण किया और न ही मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर धाराएं बढ़ाई हैं। इससे आक्रोशित प्रधान ने पुलिस अधीक्षक प्रतापगढ़ से पूरे मामले की शिकायत की है।
प्रधान ने यह भी आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस हमलावरों से मिली हुई है। एसपी से शिकायत के बाद एसओ द्वारा उन्हें धमकाने और विवेचक पर जांच प्रभावित करने का दबाव बनाने की भी बात कही गई है।
संगठन पर भी उठाए सवाल-पीड़ित प्रधान ने यह भी आरोप लगाया कि जिस संगठन से उन्हें समर्थन की उम्मीद थी, वही संगठन उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। उनका कहना है कि संगठन न तो उनकी लड़ाई लड़ रहा है और न ही किसी प्रकार का सहयोग कर रहा है, जिससे वह खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रहे हैं।
वहीं, इस मामले में थाना प्रभारी मनोज सिंह तोमर ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि मुकदमा तहरीर के आधार पर दर्ज किया गया है और विवेचना जारी है। उन्होंने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद चोटों की गंभीरता के अनुसार धाराएं बढ़ाई जाएंगी। पूरे मामले ने पुलिस और संघ के संगठन की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उच्चाधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित को न्याय मिल पाता है या नहीं ?।
