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प्रतापगढः जातिगत बन्धनों को तोड़ राजा भैया ने कराया 101 कन्याओं का विवाह! राजनीति से परे सामाजिक समरसता का संदेश


कुंडा/प्रतापगढ। देश की राजनीति में जहाँ अक्सर जाति और धर्म के आधार पर राजनेता देश और समाज को बाँटने की चर्चा करतें हैं और जाति तथा धर्म के नाम पर योजनाओं और कानून को बनाकर उनका समर्थन करके सत्ता हासिल करना चाहतें हैं वहीं कुछ राजनेता ऐसे भी होतें हैं कि जिनकी पहलें ऐसी होती हैं कि जो सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों की मिसाल बन जाती हैं। कुछ ऐसी ही पहल प्रतापगढ़ जिले के कुंडा विधानसभा क्षेत्र के विधायक एवं राष्ट्रीय जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुंवर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया भी विगत कई वर्षों से करते चले आ रहें हैं, जो देश और समाज की एकता के लिए एक मिसाल बन गई है।

वर्ष 1993 से लगातार एक अनूठी परंपरा का निर्वहन करते हुए राजा भैया हर साल 101 कन्याओं का सामूहिक विवाह कराते आ रहे हैं। यह आयोजन देवरहवा बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से किया जाता है, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों और जातियों की बेटियों का विवाह सम्मानपूर्वक संपन्न कराया जाता है। तीन दशक से भी अधिक समय से चल रही यह परंपरा अब सामाजिक सेवा और समरसता का प्रतीक बन चुकी है।

14 मार्च 2026 को भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजा भैया द्वारा 101 कन्याओं का सामूहिक विवाह संपन्न कराया गया। जिसमें  इस आयोजन में विभिन्न जातियों और समुदायों पटेल 29, सरोज 39, गौतम 11, प्रजापति 05, सोनकर 04, मौर्य 03, धुरिया 02 तथा पाल, चैरसिया, नाई, विश्वकर्मा, भारती, लोध, निषाद तथा पथरकट की एक-एक बेटियाँ शामिल रहीं, जो इस बात का संकेत है कि सामाजिक सरोकारों के सामने जातीय सीमाएं गौण हो जाती हैं। विवाह समारोह में हजारों लोगों की उपस्थिति और सामाजिक सहयोग ने इस आयोजन को और भी गरिमामय बना दिया।

आज के समय में जब राजनीतिक दल अक्सर वोट बैंक की राजनीति के तहत समाज को जाति और धर्म के आधार पर संगठित करने का प्रयास करते हैं, ऐसे समय में यह पहल एक अलग संदेश देती है। विशेष रूप सवर्ण वर्ग के क्षत्रिय समाज से आने वाले राजा भैया द्वारा सभी वर्गों की बेटियों के विवाह की जिम्मेदारी उठाना सामाजिक समावेश और मानवीय संवेदना की मिसाल माना जा रहा है।

यह आयोजन केवल एक सामूहिक विवाह नहीं, बल्कि समाज में आपसी सहयोग, भाईचारे और समरसता की भावना को मजबूत करने का माध्यम भी है। तीन दशक से निरंतर जारी यह परंपरा बताती है कि यदि जनप्रतिनिधि चाहें तो राजनीति से आगे बढ़कर समाज के लिए स्थायी और सकारात्मक उदाहरण स्थापित कर सकते हैं।

कुंडा की धरती पर हर वर्ष होने वाला यह आयोजन अब एक सामाजिक उत्सव का रूप ले चुका है, जो यह संदेश देता है कि समाज की वास्तविक शक्ति एकता, सहयोग और मानवीय मूल्यों में निहित है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि सत्ता के लिए देश की जनता को जातियों और समुदायों में विखंडित करके सत्ता सुख की चाह रखने वाले देश के राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को राजा भैया के कृत्यों और पहल से सीख लेनी चाहिए कि कैसे समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चला जाता है और उन वर्गों के साथ किस तरह से मानवीय रिश्तों को प्रगाढ़ बनाया जा सकता है।

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