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आगराः तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जियोप्रॉम्प्टिंग कार्यशाला का ऐतिहासिक व प्रेरणादायक समापन


आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के विदेशी भाषा विभाग के तत्वावधान में खंदारी परिसर स्थित जे.पी. सभागार में आयोजित “प्रॉम्प्टिंग कौशल एवं उन्नत अनुप्रयोग” विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जियोप्रॉम्प्टिंग कार्यशाला का भव्य समापन शुक्रवार, 7 फरवरी को अत्यंत गरिमामय, शैक्षणिक एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। यह कार्यशाला विश्वविद्यालय के अकादमिक इतिहास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (।प्) आधारित नवाचारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं दूरदर्शी पहल के रूप में उभरकर सामने आई।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य शिक्षण, शोध, भाषा-अध्ययन, क्षेत्रीय अध्ययन एवं बहुविषयक अकादमिक क्षेत्रों में एआई के प्रभावी, व्यावहारिक, रचनात्मक एवं नैतिक उपयोग को प्रोत्साहित करना रहा। तीन दिनों तक चले इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिला कि जियोप्रॉम्प्टिंग किस प्रकार पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों को आधुनिक, संवादात्मक और परिणामोन्मुख बना सकती है।

कार्यशाला के दौरान देश-विदेश से पधारे विशेषज्ञों ने प्रॉम्प्टिंग की मूल अवधारणा, उसकी संरचना, तार्किक ढांचे तथा उन्नत अनुप्रयोगों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

प्रतिभागियों को यह भी बताया गया कि किस प्रकार सटीक एवं संदर्भ-आधारित प्रॉम्प्ट्स के माध्यम से एआई से गुणवत्तापूर्ण, भरोसेमंद एवं विश्लेषणात्मक आउटपुट प्राप्त किया जा सकता है, जो शोध और शिक्षण दोनों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

समापन दिवस के प्रातः सत्र में पुदुचेरी से पधारे प्रख्यात एआई विशेषज्ञ डॉ. अरुणकुमार संथालिंगम ने उन्नत प्रॉम्प्टिंग तकनीकों, इटरेटिव प्रॉम्प्टिंग, मेटा-प्रॉम्प्टिंग तथा संदर्भ-सचेत (ब्वदजमÛज-ंूंतम) प्रॉम्प्टिंग पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने वास्तविक जीवन से जुड़े उदाहरणों एवं लाइव डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार असंरचित आंकड़ों को एआई की सहायता से संरचित, विश्लेषणात्मक एवं अर्थपूर्ण परिणामों में बदला जा सकता है। उनका सत्र तकनीकी दृष्टि से समृद्ध होने के साथ-साथ भविष्य के शोध कार्यों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा।

इसके पश्चात फ्रांस से पधारे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ डॉ. निकोलस मार्टिन ने समापन सत्र को संबोधित करते हुए वैश्विक शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य में जियोप्रॉम्प्टिंग की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज विश्व स्तर पर शिक्षा, शोध एवं नीति-निर्माण में एआई की भूमिका निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि प्रभावी प्रॉम्प्टिंग केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि स्पष्ट सोच, तार्किक संरचना एवं नैतिक जिम्मेदारी का समन्वय है।

समापन समारोह को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. आशु रानी ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा एवं शोध के क्षेत्र में एक परिवर्तनकारी शक्ति बन चुकी है। जियोप्रॉम्प्टिंग जैसी कार्यशालाएँ शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को नवाचार, तकनीक एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करती हैं तथा विश्वविद्यालय को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक समुदाय से जोड़ने का कार्य करती हैं।

वहीं के-एम-आई के निदेशक डॉ. प्रदीप श्रीधर ने कहा कि जियोप्रॉम्प्टिंग केवल एक तकनीकी अभ्यास नहीं, बल्कि सोचने, विश्लेषण करने एवं समस्या-समाधान की आधुनिक पद्धति है। यह कार्यशाला प्रतिभागियों को एआई के रचनात्मक, व्यावहारिक एवं जिम्मेदार उपयोग की गहरी समझ प्रदान करती है।

कार्यशाला में सहभाग करने वाले प्रतिभागियों ने इसे अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताया। प्रतिभागी द्विवेदी जी ने कहा कि प्रॉम्प्टिंग की तकनीकों को जिस सरल एवं व्यावहारिक तरीके से समझाया गया, उससे एआई के उपयोग को लेकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। वहीं प्रतिभागी कुन्दन शाह ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से प्रत्यक्ष संवाद और लाइव डेमोंस्ट्रेशन को इस कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बताया।

सभी शैक्षणिक सत्रों के उपरांत प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। इस अवसर पर विदेशी भाषा विभाग के समन्वयक एवं कार्यशाला के संयोजक डॉ. प्रदीप वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन से जुड़े सदस्यों का आभार व्यक्त किया।

तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में देश-विदेश से लगभग 145 प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की। समापन समारोह में डॉ. प्रदीप वर्मा, डॉ. आदित्य प्रकाश, अनुज गर्ग, विशाल शर्मा, डॉ. कृष्ण कुमार, डॉ. संदीप सिंह, अंगद सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। यह कार्यशाला ज्ञान, नवाचार एवं वैश्विक शैक्षणिक उत्कृष्टता की दिशा में एक सफल, प्रभावशाली एवं ऐतिहासिक आयोजन के रूप में संपन्न हुई।

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