सिद्धार्थ नगर ! आज हम सब भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर जी को उनके 102वें जन्मदिन पर उन्हें गहरी श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण कर रहे हैं। वे उत्तर भारत में डॉ. राम मनोहर लोहिया के बाद सामाजिक न्याय के दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं, जिनका प्रभाव बिहार की राजनीति से लेकर धीरे-धीरे कई अन्य राज्यों में तेजी के साथ फ़ैल रहा है। वे बिहार की राजनीति में लगभग चार दशकों तक छाए रहे। उनकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य बिहार में जाति और वर्ग के सवालों पर सामाजिक जागरूकता और सामाजिक सुरक्षा देने का था, जिसके लिए वे उन संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करने में लगे रहते थे जिसका मुख्य कारण समाज में व्याप्त सामाजिक असमानता थी। अंततः वे कई मामलों में सफल हुए जिसके कारण उन्हें बिहार में ‘वंचितों का राज’ स्थापित करने के रूप में भी देखा जाता है। वह सन 1948 से 1952 के बीच बिहार किसान कमेटी के संयुक्त सचिव रहे और इसी अवधि में वे पहली बार विधायक चुने गए। धीरे-धीरे वे विधानसभा में एक प्रभावशाली और वंचितों की सशक्त आवाज़ बनकर उभरे। उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में गरीबों और हाशिए पर खड़े वर्गों के लिए शिक्षा की पहुँच को व्यापक बनाने और उनकी सामाजिक सुरक्षा हेतु लगातार प्रयास किए। ये सारे प्रयास उनके मुख्यमंत्रित्व काल में भी दिखाई देते हैं जब वे दलित समुदायों की सुरक्षा के लिए विशेष पुलिस थानों की स्थापना करते हैं, पुलिस उड़नदस्ता की टीम बनाते हैं और उस समय के कई चोर, गुंडे और बदमाशों को जेल में डलवा देते हैं। वे अपने पहले कार्यकाल में सबसे अधिक सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देते हैं ताकि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। वहीं पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरी में प्रतिनिधित्व पिछड़ा आयोग का गठन करते हैं। हालांकि उनकी सरकार गिर जाती है और इस आयोग को भी भंग कर दिया जाता है, इसके बावजूद प्रतिनिधित्व की राजनीति के लिए जो वैचारिक और नीतिगत आधार उन्होंने तैयार किया था वही आगे चलकर मुंगेरी लाल आयोग के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस आयोग की अनुसंशाओं को वे अपने दूसरे कार्यकाल में लागू करने का काम करते हैं। उनके लिए यह संयोग भी रहा होगा कि जिस आयोग को उन्होंने सामाजिक न्याय की दिशा के रूप में अथक प्रयास किया था अनतः उसे वे ख़ुद लागू करके बिहार की राजनीति में एक नई राजनीतिक बहस को छेड़ देते हैं। उनके इस फैसले का भारी विरोध हुआ लेकिन वे किसी दबाव में नहीं झुके। इसके बाद वे सत्ता से हमेशा कि लिए दूर हो गए। इस फैसलें के बाद उनके राजनीतिक जीवन के दस वर्ष बहुत उथल पुथल दिखाई देते हैं लेकिन एक विचारक के रूप में ये साल काफ़ी महत्वपूर्ण भी दिखाई देते हैं। जिन पर बहुत कम चर्चा की जाती है। शायद, यह इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने कुछ भी लिखित दस्तावेज़ नहीं छोड़े हैं।
यदि कर्पूरी ठाकुर के सामाजिक-राजनीतिक जीवन को गंभीरता से देखें, तो स्पष्ट होता है कि उनकी नीतियों का केंद्र शिक्षा और वंचित समुदाय रहे हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि ये दोनों पहलू उनके विचारों के केंद्र में क्यों थे। इसका उत्तर उनकी सामाजिक स्थिति में निहित है, क्योंकि उसी सामाजिक स्थिति के भीतर उनकी चेतना और मानसिक संरचना का निर्माण हुआ था। किसी भी व्यक्ति को समझने के लिए उसके जीवन के दो प्रमुख पहलुओं का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। सबसे पहला, उसकी सामाजिक स्थिति जो इस बात को तय करती है कि व्यक्ति की पहचान समाज में उसकी स्थिति से किस गुथी हुई है और वह विभिन्न सामाजिक समूहों का अनुभव किस प्रकार करता है।
दूसरा, उसके समय के यथार्थ को समझा जाए जो उस कालखंड में निहित होता है। अबतक कर्पूरी ठाकुर को जितना समझा गया है उसमें इन दोनों पहुलुओं पर कोई विस्तृत चर्चा नहीं हुई है। उनके सामाजिक स्थिति पर भी कम ही चर्चा की गई है। अपने जीवन के आख़िरी वर्षों में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भाषण दिए। इन भाषणों में कुछ ऐसे शब्द बार-बार सामने आते हैं, जो शिक्षा और वंचित समुदाय को लेकर उनकी सोच को समझने में खास मदद करते हैं। वे अक्सर अपने भाषणों में जातियों को तीन वर्गों ‘पुरस्कृत, बहिष्कृत और तिरस्कृत’ के रूप में संबोधित करते थे। जिसमें पुरुष्कृत का आशय उच्च वर्ग की जातियों, बहिष्कृत का आशय दलित जातियों और तिरस्कृत जातियों का आशय पिछड़ी जातियों से था। पिछड़ी जातियों के भीतर जो सबसे अधिक वंचित, यानी अतिपिछड़े थे, उन्हें वे अक्सर ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ कहकर संबोधित करते थे। इन तीन शब्दों के सहारे उनकी सामाजिक समझ को बेहतर ढंग से पकड़ा जा सकता है, और इन्हीं समुदायों पर आगे चर्चा करना चाहता हूँ।
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। इसके केंद्र में वही अतिपिछड़ी जातियाँ हैं, जिन्हें लंबे समय तक संख्यात्मक रूप से बड़ी जातियों के मुक़ाबले राजनीतिक रूप से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। अब ये जाति समूह अपने सवालों को लेकर खुलकर सामने आ रहे हैं। इनकी प्रमुख माँगें सामाजिक सुरक्षा, आरक्षण के भीतर उपवर्गीकरण और पर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़ी हैं। ये समूह अपने मुद्दों पर इस तरह मुखर होने में लगभग तीन दशक से अधिक समय लगा जबकि कर्पूरी ठाकुर ने इन्हीं सवालों को आज से लगभग 46 वर्ष पहले ही सामाजिक सुरक्षा और वर्गीकरण को समाधान के रूप में लागू करके दूरदृष्टिता का परिचय दे दिया था। इस नीति के सबसे बड़े लाभार्थी बिहार के अतिपिछड़े वर्ग रहे हैं, जिनका कई स्तरों पर प्रतिनिधित्व बेहतर हुआ। इससे लोकतंत्र की पहुँच ज़मीनी स्तर तक पहुँची।
इसके विपरीत, कई हिंदी-भाषी राज्यों में न तो वर्गीकरण की व्यवस्था है और न ही अतिपिछड़ों के लिए जिला स्तर पर छात्रावास जैसी सुविधाएँ, जिसके कारण करोड़ों वंचित तबकों के छात्र विश्वविद्यालयी शिक्षा से बाहर रह जाते हैं।
कर्पूरी ठाकुर जिन वर्गों को ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ कहकर संबोधित करते थे, उनकी प्रमुख समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने सरकार में रहते हुए जो भी संभव हो सका, वह किया। उनका मानना था कि इन वर्गों की पहली समस्या उनकी ‘मनहीनता’ है, जिसके कारण वे अपनी कठिनाइयों को लेकर खुलकर बोल नहीं पाते।
दूसरी ओर, वे शारीरिक रूप से भी कमज़ोर हैं और तीसरी बात यह कि वे आर्थिक तौर पर भी बेहद पिछड़े हुए हैं। इस तरह ये समुदाय तीनों स्तरों पर कमजोर हैं, और यही वजह है कि वे अपने हक़ और अधिकारों की बात उस तीव्रता और दबाव के साथ नहीं रख पाते, जैसी ताक़त समाज के अन्य वर्ग दिखा पाते हैं।
कर्पूरी ठाकुर अपने समय से आगे इन वर्गों के बारे में इसलिए सोंच पाने में समर्थ थे क्योंकि वे स्वयं अतिपिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखते थे। लेकिन आज ये स्थिति बदली है और अब ये समुदाय राष्ट्रीय स्तर पर जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने के लिए मुखर हैं। ये समुदाय सामाजिक सुरक्षा और आरक्षण के उपवर्गीकरण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कर्पूरी ठाकुर के 102वीं जन्मदिवस के अवसर पर सरकार को अतिपिछड़ों की प्रमुख समस्याओं के निदान हेतु उनकी सुरक्षा, भागीदारी, शिक्षा और आर्थिकी हेतु नीतियों की तरफ़ आगे बढ़ना चाहिए ताकि कर्पूरी ठाकुर के ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ वर्गों की लोकतंत्र में बहाली हो सके।
