आज गरीब नाई परिवार में जन्म लेकर तमाम भेदभाव झेलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे गुदड़ी के लाल कहें जाने वाले जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती है जिसे आज कुछ वोट के सौदागर मना रहे हो या उनकी जाति के लोग अथवा उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न मिलने पर उनकी जाति के लोग फूले नहीं समा रहे हो या भारत रत्न देने वाली वर्तमान सरकार का गुणगान कर रहे हो लेकिन आजादी के पिचहतर साल बाद भी शासन सत्ता में हिस्सेदारी न मिलने के बाबजूद विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कही ओबीसी मोर्चा तो कहीं छोटे छोटे पद दिए जाने पर एक दूसरे को दी जा रही शुभकामनाएं इस बात का पक्का सबूत है कि कर्पूरी जी जाति के लोग भले ही बड़बोले हो लेकिन भोले भी कम नहीं है हालांकि यह खुशी की बात है कि उनके समाज में सत्ता में जानें की भूख तेजी से पनपी है लेकिन उनकी शान से बड़े बड़े कसीदे पढ़ने वाले लोग जरा यह बताने का काम करेंगे कि उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले में केवल नंदवंशी ही उनकी जयंती क्यों मना रहे हैं अन्य जाति व धर्म के लोगों को क्यों सांप सूंघ गया है मैं सभी सामाजिक चिंतको से कहना चाहता हूं कि आप लोग भले ही मेरी स्पष्टवादिता पर गुस्सा करते रहे लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कर्पूरी जी को भारत रत्न मिलने से सैन सविता समाज के लोग ऐसे खुश हो रहे हैं जैसे घर बैठे बिठाये धन धरती शिक्षा सम्मान सब कुछ मिल गया हो जबकि भारत रत्न देने वाली सरकार प्रशंसा की पात्र तो है लेकिन सैन सविता समाज के लोगों को समझना चाहिए की कर्पूरी जी ऐतिहासिक पुरुष थे ईमानदारी और सादगी उनकी रगो में बसी थी परंतु दुर्भाग्य है कि जिस कर्पूरी जी को देशभर में समस्त ओबीसी ही नहीं गरीबो का हमदर्द माना जा रहा था वह केवल सैन सविता नंद समाज की खुशी का और उनके नाम वोट इकठ्ठा करने का सामान बनकर रह गया है ,लेकिन उनके रहते भी समाज का कोई व्यक्ति विधायक सांसद नहीं बन सका था यही हाल अन्य दलों का है मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जब तक सैन सविता सहित समस्त ओबीसी समाज के लोगों की सत्ता में जनसंख्या अनुपात से भागीदारी नहीं होगी तब तक कर्पूरी जी का सपना साकार नहीं होंगा। इतना ही बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वारा लिखित भारत के संविधान में बनाई गई आरक्षण व्यवस्था को वास्तविकता में रखकर निजीकरण में ही नहीं अब तक बनाएं गए रोहिणी आयोग सामाजिक न्याय समिति या कर्पूरी ठाकुर फार्मूला लागू करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है कि चुनाव में उनके घर जाने वालों या उत्तर प्रदेश में कर्पूरी प्रेम की नौटंकी करने वाले दलों को मान्यवर कांशीराम जी के रास्ते पर चलकर सभी जातियों में सत्ता की भूख मिटानी होगी वरना सत्ताशीन होने के चक्कर में नवगठित राजनीतिक दलों की संख्या तेजी से बढ़ती जाएगी भारत रत्न देने या पुरस्कृत करने से किसी समाज का भला नहीं हो सकता और न देश चलाया जा सकता है भारत रत्न देना लेने वाले के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है और ऐतिहासिक पुरूषों को भारत रत्न देना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन देश और समाज का विकास करने के लिए सरकार हो या राजनीतिक दल सभी को सामाजिक भेदभाव का त्याग कर धन धरती शिक्षा सम्मान देना चाहिए वरना ये भोले भाले बड़बोले समाज के लोग बड़ी-बड़ी बातें करने में मस्त हैं तथा ईमानदारी से भारत रत्न देने वाली सरकार का गुणगान कर रहे हैं जिसकी वर्तमान सरकार हकदार भी है लेकिन सरकार को चाहिए कि वह कर्पूरी जी को भारत रत्न देने के साथ-साथ कर्पूरी ठाकुर फार्मूला भी लागू करने का काम करें और भाजपा सपा बसपा कांग्रेस सहित सभी दलों को चाहिए की वह जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी को आधार बनाकर प्रत्याशी बनाने की घोषणा करें जब तक कर्पूरी ठाकुर फार्मूला और प्रत्याशी चयन लागू नहीं होता है तब तक वंचित जातियों सहित सैन सविता समाज के लोगों को कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। और यदि मिला भी तो ओबीसी में आने वाली बाहुबली जातियां पूरा हिस्सा डकारती रहेगी। मुझे क्या मैं तो वास्तविकता को आधार मानकर निकला हू मेरी भी एक सीमा है स्वस्थ होकर एक बार और प्रयास कर रहा हूं वरना वंचित समाज के लोगों का यही हाल रहा तो मैं भी राजनीति करनी हुई तो अवसर वादी वरना अखबार वादी बनकर वापिस लौट सकता हूं हालांकि मुझे उम्मीद है कि वंचित समाज में सत्ता के प्रति तेजी से जागरूकता पनप रही है परंतु अफसोस है कि अपने लोग आजादी का लम्बा समय बीतने के बावजूद भी उन्हीं दलों से उम्मीद लगाए बैठे हैं जिन्होंने कभी इन पर रहम नहीं किया यदि इनके अंदर संविधान की शपथ लेने के बाद न्यायिक सोच होती तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि देशभर में वंचित जातियों के 85 प्रतिशत विधायक सांसद होते,इसलिए कर्पूरी वादी लोगों से अनुरोध करना चाहता हूं की बड़ी-बड़ी बातें ना करके जमीनी बात करें और सच्चाई पर पर्दा न डालकर अपनी हिस्सेदारी मजबूत करें, तभी आप लोग समाज के वास्तविक चिंतक कहला सकते हैं। वरना सभी जानते हैं कि चुनाव पांच साल में आते हैं जो काफी लम्बा समय होता है जबकि सैन सविता समाज के मात्र सौ लोग हिस्सेदारी लेने में जुट गए तो पाल प्रजापति सैनी कश्यप बढई सहित सभी अतिपिछड़ी जातियां भी साथ में खड़ी होकर जो देश की राजनीति में नया अध्याय लिख सकेंगी और कर्पूरी जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
विनेश ठाकुर सम्पादक
विधान केसरी लखनऊ
