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आरोपी डॉक्टरों ने पूछताछ में किए बड़े खुलासे, सिग्नल App का इस्तेमाल! कई राज उगले


जैश-ए-मोहम्मद के फिदायीन मॉड्यूल से जुड़े पकड़े गए आरोपी डॉक्टरों से पूछताछ और उनके मोबाइल फोन में जांच एजेंसियों को बड़े और चौंकाने वाले सबूत मिले हैं. आरोपियों के मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में सिग्नल ऐप पर बना एक ग्रुप मिला है, जिसका एडमिन फरार मॉड्यूल सरगना डॉक्टर मुजफ़्फ़र था और इसी ग्रुप में डॉक्टर उमर, डॉक्टर मुजम्मिल, डॉक्टर आदिल और डॉक्टर शाहीन भी शामिल थे.

जांच अधिकारियों के अनुसार, डॉक्टर उमर की भूमिका इस मॉड्यूल में सबसे अहम थी. हर बार जब डॉक्टर उमर अमोनियम नाइट्रेट, ट्रायएसिटोन ट्राइपरॉक्साइड (TATP) या कोई अन्य केमिकल खरीदता था, तो उसकी विस्तृत जानकारी ग्रुप में डाली जाती थी कि कितनी मात्रा खरीदी गई, किस स्रोत से ली गई और आगे इसकी तैयारी कैसे होगी. डिजिटल फुटप्रिंट्स से स्पष्ट हुआ है कि अमोनियम नाइट्रेट, TATP, सल्फर डाईऑक्साइड समेत अधिकांश विस्फोटक केमिकल और टाइमर, वायर जैसे उपकरणों की खरीद उमर ने ही की थी.

खरीदे गए इन विस्फोटकों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी डॉक्टर मुजम्मिल को सौंपी गई थी और जांच में सामने आया कि जब भी विस्फोटक और केमिकल का स्टॉक मुजम्मिल के किराए के घर में शिफ्ट किया जाता था, तो मुजम्मिल उसकी तस्वीरें खींचकर ग्रुप में भेजता था, ताकि यह पुष्टि हो सके कि सारा सामान सुरक्षित ढंग से जमा हो चुका है. यही नहीं, मॉड्यूल द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली i20 कार की खरीद की जानकारी भी डॉक्टर उमर ने ही ग्रुप में साझा की थी.

पूछताछ में एक और अहम नाम सामने आया है फैसल इशाक भट्ट का, जो इस मॉड्यूल का जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा हैंडलर बताया जा रहा है. आरोपियों के मुताबिक, विस्फोटक इकट्ठा करने, उसकी तैयारी, विस्फोटक की टेस्टिंग समेत मॉड्यूल से जुड़ी अन्य जानकारी रोजाना इस हैंडलर को सौंपने का काम डॉक्टर उमर ही करता था और ये सारी सूचनाएं सीधे इसी फैसल इशाक़ भट्ट को भेजता था. हालांकि पकड़े गए आरोपियों को इस हैंडलर की असली पहचान अभी तक नहीं हो पाई है.

एजेंसियों के अनुसार, फरार मुज़फ़्फर के अफ़ग़ानिस्तान जाने के बाद से पूरे मॉड्यूल के संचालन और रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी यही हैंडलर संभाल रहा था. जांच में यह भी सामने आया कि यह हैंडलर +966 कोड वाले सऊदी अरब के वर्चुअल नंबर का इस्तेमाल कर रहा था और एजेंसियां अब इसकी वास्तविक पहचान उजागर करने में जुटी हैं. शुरुआती आकलन के अनुसार, ‘फैसल इशाक़ भट्ट’ नाम भी एक छद्म नाम है और अनुमान है कि पाकिस्तान में मौजूद जैश के नेटवर्क ने जानबूझकर एक कश्मीरी नाम का उपयोग किया, ताकि पूरी साजिश को स्थानीय बनाने और पाकिस्तानी तत्वों की भूमिका को छुपाने में मदद मिल सके यानी plausible deniability की रणनीति.अब तक की जांच में जैश-ए-मोहम्मद के चार पाकिस्तानी हैंडलरों के नाम सामने आ चुके है और हैं- अबू उक़ाशा,हंजुल्लाह, निसार और फैसल इशाक भट्ट.

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