पशु लैब्स टेस्टिंग के नए नियमों के खिलाफ अंबिका शुक्ला हुईं सख्त
November 01, 2026
लैब्स में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार के प्रस्तावित नियमों के मसौदे पर सार्वजनिक राय देने की समय-सीमा 5 नवंबर तक की है। ऐसे में एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट अंबिका शुक्ला ने इंडिया टीवी से खास बात की है। उन्होंने बताया है कि लैब में जानवरों पर जब प्रयोग किए जाते हैं तो उन्हें कितनी तकलीफों से गुजरना पड़ता है।
अंबिका ने बताया कि लैब्स में प्रयोग के दौरान जानवरों को भी दर्द होता है, उन्हें डर लगता है और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। अंबिका ने प्रयोगशालाओं में जानवरों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि डर, दर्द, तनाव, अकेलापन और भूख जैसी भावनाएं केवल इंसानों तक सीमित नहीं हैं। जानवर भी इन सभी परिस्थितियों से गुजरते हैं, लेकिन वे अपनी तकलीफ शब्दों में बयां नहीं कर सकते।
अंबिका ने बीगल कुत्तों का उदाहरण देते हुए बताया कि प्रयोगशालाओं में उनकी आवाज को दबाने के लिए उनके वोकल कॉर्ड्स तक काट दिए जाते थे। उन्होंने दावा किया कि कई बीगल ऐसे प्रयोगों से बचकर निकले हैं, लेकिन जीवनभर अपनी आवाज गंवा चुके हैं। उन्होंने खरगोशों पर शैंपू की जांच के दौरान होने वाले प्रयोगों का जिक्र किया। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया में खरगोश के सिर को एक उपकरण में फंसाकर उसकी आंखें खुली रखी जाती थीं और उनमें शैंपू की बूंदें डाली जाती थीं। इससे जानवरों को गंभीर पीड़ा होती है। उन्होंने लिपस्टिक और अन्य उत्पादों की जांच में भी जानवरों पर होने वाले दर्दनाक प्रयोगों को लेकर चिंता जताई।
लैब में होने वाले प्रयोगों में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर प्रस्तावित नए ड्राफ्ट नियमों पर बहस तेज हो गई है। इन नियमों को लेकर एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट और पीपल फॉर एनिमल्स से जुड़ी अंबिका शुक्ला ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रस्तावित नियम वैज्ञानिक रिसर्च को बेहतर बनाने के बजाय उसे कई कदम पीछे ले जा सकते हैं। इसका असर केवल जानवरों की सुरक्षा और उनके कल्याण पर ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रयोगों के नतीजों की विश्वसनीयता और इंसानों की सेहत पर भी पड़ सकता है।
प्रस्तावित ड्राफ्ट नियमों पर सवाल उठाते हुए अंबिका शुक्ला ने कहा कि पहले प्रयोगों के लिए उन्हीं जानवरों का इस्तेमाल किया जाता था, जिन्हें नियंत्रित परिस्थितियों में प्रयोगशालाओं में पाला जाता था। इससे उनकी सेहत और अन्य स्थितियों पर नजर रखी जा सकती थी। लेकिन नए प्रस्तावों में जानवरों को दूसरी जगहों से लाने की छूट दिए जाने को लेकर उन्होंने चिंता जताई।
उनका कहना है कि नियमों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जानवर कहां से लाए जा सकते हैं। ऐसे में आशंका है कि बाजार, सड़कों या जंगलों से भी जानवरों को प्रयोग के लिए लाया जा सकता है। इससे आवारा कुत्तों और बिल्लियों के साथ-साथ दूसरे जानवरों और वन्यजीवों के भी प्रयोगों में इस्तेमाल होने का खतरा बढ़ सकता है।
उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बदलाव पर सवाल उठाया। उनके मुताबिक, पहले प्रयोगों को मंजूरी देने और उनकी निगरानी करने में केंद्रीय स्तर की कमेटी की भूमिका थी, लेकिन नए प्रस्तावों में संस्थानों को अपने शोध को खुद मंजूरी देने की व्यवस्था का प्रावधान है। शुक्ला ने इसे हितों के टकराव की स्थिति बताते हुए कहा कि कोई संस्थान अपने ही शोध को मंजूरी देने से इनकार क्यों करेगा? इससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर हो सकती है।
