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उत्तर प्रदेश राजनीतिक विशेष ! यूपी की सियासत में कश्यप-निषाद समाज की हिस्सेदारी की हुंकार, दो करोड़ मतदाताओं की ताकत का दावा


  • मुजफ्फरनगर की वंचित अधिकार रैली के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर बहस तेज, जनसंख्या के अनुपात में टिकट वितरण की उठी मांग

  • कश्यप, निषाद, मल्लाह, बिंद, कहार, धीवर, केवट और रैकवार सहित मछुआरा समुदायों की राजनीतिक भागीदारी का सवाल चर्चा में, प्रमुख दलों की टिकट वितरण नीति पर उठे सवाल
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चरथावल, थानाभवन, कैराना, आंवला और मीरापुर सहित पूर्वांचल की मझवां, गोरखपुर ग्रामीण और मेंहदावल सीटों पर सामाजिक समीकरणों को लेकर चर्चा
  • इंजीनियर देवेंद्र कश्यप के नेतृत्व में मुजफ्फरनगर में आयोजित वंचित अधिकार रैली में सामाजिक न्याय और सत्ता में हिस्सेदारी का मुद्दा प्रमुखता से उठा

लखनऊ/मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले अतिपिछड़े समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। कश्यप, निषाद, मल्लाह, बिंद, कहार, धीवर, केवट, रैकवार और बाथम सहित अनेक समुदायों के प्रतिनिधित्व को लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आवाज उठाई है। इन संगठनों का कहना है कि प्रदेश में बड़ी मतदाता आबादी होने के बावजूद विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा तथा राजनीतिक दलों के संगठनात्मक पदों पर अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिल पाई है।


28 अक्टूबर को मुजफ्फरनगर के राजकीय इंटर कॉलेज मैदान में सामाजिक न्याय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंजीनियर देवेंद्र कश्यप के नेतृत्व में आयोजित वंचित अधिकार रैली में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। कार्यक्रम में इंडियन जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनेश ठाकुर 'कर्पूरी', राष्ट्रीय उदय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबूराम पाल तथा सामाजिक न्याय पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजेश कुमार तुरैहा सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों की भागीदारी रही।

रैली में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल मतदान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि विधानसभा टिकट, संगठनात्मक जिम्मेदारी और सरकार में भागीदारी तक उसका विस्तार होना चाहिए।

सवा करोड़ मतदाताओं का दावा, लेकिन आधिकारिक जातिवार आंकड़ों की जरूरत

कश्यप-निषाद और संबंधित समुदायों की संयुक्त मतदाता संख्या सवा करोड़ से अधिक होने का दावा किया जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही 40 से 45 लाख कश्यप मतदाता होने का अनुमान प्रस्तुत किया गया है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए निर्वाचन क्षेत्रवार जातिगत मतदाता सर्वेक्षण और विश्वसनीय जनसांख्यिकीय आंकड़ों की आवश्यकता है।

उत्तर प्रदेश की मतदाता सूचियों में सामान्यतः जातिवार विवरण प्रकाशित नहीं किया जाता। ऐसे में विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में किसी एक जाति या संबंधित जाति समूह की मतदाता संख्या के अनुमान को आधिकारिक आंकड़ा नहीं माना जा सकता।

इसके बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्वपूर्ण है। सामाजिक संगठनों का तर्क है कि टिकट वितरण में जातियों और समुदायों की भागीदारी का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन समूहों को कितने अवसर मिले हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कश्यप समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर और पीलीभीत जिलों में कश्यप, कहार, धीवर तथा संबंधित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी को लेकर सामाजिक संगठनों में चर्चा चल रही है।


मुजफ्फरनगर की चरथावल, मीरापुर, पुरकाजी और सदर विधानसभा सीटों के अलावा शामली की थानाभवन और कैराना, सहारनपुर की नकुड़, गंगोह और बेहट तथा मेरठ की सरधना, किठौर और सिवालखास सीटों का उल्लेख इस बहस में किया जा रहा है।

सामाजिक प्रतिनिधियों का आरोप है कि भाजपा, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसे प्रमुख दलों ने कई क्षेत्रों में कश्यप समाज को उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप टिकट नहीं दिए। हालांकि इस आरोप की वस्तुनिष्ठ जांच के लिए पिछले चुनावों में सभी दलों द्वारा उतारे गए प्रत्याशियों का जातिवार विवरण देखना आवश्यक होगा।

रुहेलखंड में आंवला से जलालाबाद तक प्रतिनिधित्व पर चर्चा

रुहेलखंड की आंवला, फरीदपुर, बिसौली, सहसवान, तिलहर, जलालाबाद और पीलीभीत सदर विधानसभा सीटों को भी कश्यप और संबंधित समुदायों की राजनीतिक उपस्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया जा रहा है।

स्थानीय स्तर पर सक्रिय सामाजिक प्रतिनिधियों का कहना है कि इन क्षेत्रों में समुदाय की आबादी और चुनावी टिकटों में भागीदारी के बीच अंतर का अध्ययन होना चाहिए। राजनीतिक दलों की ओर से सामाजिक संतुलन बनाने के दावों के बीच वास्तविक टिकट वितरण का तुलनात्मक विवरण इस बहस को अधिक तथ्यपरक बना सकता है।

पूर्वांचल में निषाद, बिंद और मल्लाह समुदायों की भागीदारी

पूर्वी उत्तर प्रदेश में निषाद, बिंद, मल्लाह और केवट समुदायों की राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न लंबे समय से विभिन्न दलों और सामाजिक संगठनों के एजेंडे में रहा है।

गोरखपुर ग्रामीण, पिपराइच, चौरी-चौरा, कैम्पियरगंज, मझवां, चुनार, हंडिया, फाफामऊ, मेजा, मेंहदावल और खलीलाबाद जैसी विधानसभा सीटों को लेकर सामाजिक समीकरणों की चर्चा होती रही है।

इसी प्रकार गाजीपुर, चंदौली, मऊ और अंबेडकरनगर के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में भी संबंधित समुदायों की राजनीतिक भूमिका पर विचार किया जा रहा है।

पूर्वांचल में निषाद समुदाय के नाम पर राजनीति करने वाले दलों की मौजूदगी के बावजूद यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का लाभ व्यापक समुदाय तक किस सीमा तक पहुंचा है और किन उपसमूहों को अभी भी पर्याप्त अवसर नहीं मिले हैं।

तराई और बुंदेलखंड में भी हिस्सेदारी की मांग

लखीमपुर खीरी की निघासन, पलिया और धौरहरा, बहराइच की नानपारा और महसी, श्रावस्ती की भिनगा तथा गोंडा की कर्नलगंज और तरबगंज सीटों पर भी संबंधित समुदायों की राजनीतिक उपस्थिति का मुद्दा उठाया जा रहा है।

बुंदेलखंड और यमुना कछार क्षेत्र में रैकवार, बाथम, केवट तथा कश्यप समुदायों की भागीदारी के संदर्भ में तिंदवारी, बांदा सदर, हमीरपुर, कालपी, गरौठा, महरौनी, अयाह शाह और भोगनीपुर विधानसभा सीटों का उल्लेख किया जा रहा है।

इन क्षेत्रों में भी संगठनों की प्रमुख मांग राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की है।

मुजफ्फरनगर की रैली से उठी साझा राजनीतिक भागीदारी की आवाज

मुजफ्फरनगर में आयोजित वंचित अधिकार रैली की विशेषता यह रही कि विभिन्न अतिपिछड़े समुदायों से जुड़े राजनीतिक प्रतिनिधि एक मंच पर दिखाई दिए।

सामाजिक न्याय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंजीनियर देवेंद्र कश्यप ने अपने संबोधन में समाज के राजनीतिक संगठन और स्वतंत्र नेतृत्व पर जोर दिया। इंडियन जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनेश ठाकुर 'कर्पूरी' ने जनसंख्या के अनुपात में टिकट वितरण और सत्ता में भागीदारी का मुद्दा उठाया।

राष्ट्रीय उदय पार्टी के अध्यक्ष बाबूराम पाल ने भी पाल, प्रजापति, कश्यप, सैनी, सैन, विश्वकर्मा और अन्य अतिपिछड़े समुदायों को राजनीतिक नेतृत्व में अवसर देने की बात कही।

कार्यक्रम में शामिल नेताओं ने साझा राजनीतिक मंच और भविष्य के चुनावों में भागीदारी की संभावनाओं पर अपने विचार रखे।

टिकट वितरण में सामाजिक प्रतिनिधित्व बनेगा बड़ा सवाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक न्याय और जातिगत प्रतिनिधित्व के मुद्दे नए नहीं हैं। विभिन्न दल लंबे समय से पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित और अन्य समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की बात करते रहे हैं।

लेकिन राजनीतिक भागीदारी की वास्तविक स्थिति समझने के लिए विधानसभा में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या, विभिन्न दलों के प्रत्याशियों का सामाजिक विवरण, संगठनात्मक पदों का वितरण तथा सरकार में प्रतिनिधित्व जैसे पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है।

कश्यप-निषाद और संबंधित समुदायों की ओर से उठ रही मांग इसी व्यापक बहस का हिस्सा है।

फिलहाल मुजफ्फरनगर की रैली ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न को फिर सामने रखा है—बड़ी सामाजिक आबादी वाले समुदायों को राजनीतिक दलों में टिकट, नेतृत्व और निर्णय लेने की प्रक्रिया में कितनी हिस्सेदारी मिल रही है? आने वाले समय में इस प्रश्न पर विभिन्न दलों की नीतियां और प्रत्याशी चयन प्रक्रिया राजनीतिक चर्चा का विषय रहेंगी।

विधान केसरी, उत्तर प्रदेश राजनीतिक विशेष

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