अल नीनो से मंडराया सूखे का खतरा, मंहगी हो सकती है आम आदमी की थाली
August 18, 2026
भारत में मानसून को लेकर चिंता बढ़ गई है. प्रशांत महासागर में अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है. वहीं निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने इस साल देश में सूखे की आशंका 70 फीसदी तक बताई है. एजेंसी ने मानसून के अपने अनुमान को घटाकर LPA का 85 फीसदी कर दिया है.
अप्रैल में स्काईमेट ने इस साल 94 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया था. अब यह अनुमान घटकर 85 फीसदी रह गया है यानी मानसून को लेकर तस्वीर कुछ महीनों में ही काफी कमजोर हुई है.
अल नीनो में प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ता है. भारत के लिए चिंता इसलिए है क्योंकि मजबूत अल नीनो अक्सर कमजोर मानसून से जुड़ा है. अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के ताजा अनुमान के मुताबिक 2026 की शरद और सर्दियों में अल नीनो के बहुत मजबूत होने की संभावना 90 फीसदी से ज्यादा है. हालांकि अभी यह कहना सही नहीं होगा कि सुपर अल नीनो आ चुका है लेकिन इतना जरूर है कि अल नीनो मजबूत हो रहा है और भारत में कमजोर बारिश का खतरा बढ़ गया है.
इस साल मानसून की शुरुआत कमजोर रही. जून में देश में सामान्य से काफी कम बारिश हुई. जुलाई में कुछ सुधार जरूर आया लेकिन बीच में बारिश पर ब्रेक भी लगा. 1 जून से 31 जुलाई के बीच देश में बारिश सामान्य से करीब 13 फीसदी कम रही. अब स्काईमेट का अनुमान है कि अगस्त में बारिश LPA की 84 फीसदी और सितंबर में करीब 80 फीसदी रह सकती है. इसी वजह से पूरे मानसून का अनुमान घटाकर 85 फीसदी किया गया है. स्काईमेट के पैमाने पर LPA की 90 फीसदी से कम बारिश सूखे की श्रेणी में आती है. इसलिए 70 फीसदी की आशंका का मतलब यह नहीं है कि सरकार ने देश में सूखा घोषित कर दिया है.
सरकारी मौसम विभाग IMD ने भी अपने मानसून अनुमान में कमी की है. अप्रैल में IMD ने 92 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया था जिसे मई के आखिर में घटाकर 90 फीसदी कर दिया गया यानी स्काईमेट और IMD दोनों मानसून को लेकर जोखिम की तरफ इशारा कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि स्काईमेट का मौजूदा अनुमान ज्यादा कमजोर है.
कम बारिश का सबसे सीधा असर खेती पर पड़ता है. धान जैसी खरीफ फसलें मानसून पर काफी निर्भर रहती हैं. बारिश कम होने के साथ-साथ अगर बारिश का समय भी बिगड़ता है तो फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है. इसका असर आगे चलकर दाल, तिलहन और सब्जियों की कीमतों पर भी पड़ सकता है यानी कमजोर मानसून की चिंता सिर्फ किसान तक सीमित नहीं है. इसका असर आम आदमी की थाली तक पहुंच सकता है.
अगस्त और सितंबर में अगर बारिश कमजोर रही तो जलाशयों में पानी का भराव प्रभावित हो सकता है. इसका असर खासकर रबी की फसल पर पड़ सकता है. गेहूं, चना और सरसों जैसी फसलों के लिए सर्दियों में सिंचाई का पानी जरूरी होता है. इसलिए मानसून के आखिरी दो महीने इस साल की खरीफ के साथ-साथ अगली रबी फसल के लिए भी अहम हैं
कमजोर बारिश का असर खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है. जुलाई में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.45 फीसदी हो गई जबकि जून में यह 4.38 फीसदी थी. अगर बारिश की कमी से फसल उत्पादन प्रभावित होता है तो खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. RBI ने भी कमजोर और असमान मानसून को खेती और ग्रामीण मांग के लिए जोखिम माना है. वित्त वर्ष 2027 के लिए RBI ने खुदरा महंगाई का अनुमान 5 फीसदी रखा है.
कमजोर मानसून के बावजूद देश के पास सरकारी अनाज भंडार का सहारा है. भारतीय खाद्य निगम के पास गेहूं और चावल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है. इसलिए इन दोनों अनाजों की तत्काल कमी की बड़ी चिंता फिलहाल नहीं है. लेकिन दाल, तिलहन और सब्जियों की कीमतों पर नजर रखना जरूरी होगा.
मजबूत अल नीनो के कारण 2015 का उदाहरण फिर चर्चा में है. 2015 में IMD ने पहले 93 फीसदी बारिश का अनुमान दिया था. बाद में इसे घटाकर 88 फीसदी किया गया और आखिर में देश में बारिश करीब 86 फीसदी LPA रही. इस बार स्काईमेट का 85 फीसदी का अनुमान इसी दायरे में है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि 2026 बिल्कुल 2015 जैसा ही होगा. हर अल नीनो का असर एक जैसा नहीं होता.
अब आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम हैं. अगर अगस्त और सितंबर में बारिश सामान्य के करीब रही तो स्थिति काफी हद तक संभल सकती है लेकिन अगर बारिश कमजोर रही तो इसका असर खेती, जलाशयों, रबी की बुवाई और खाद्य महंगाई तक पहुंच सकता है.
