मुकदमों पर SC में चौंकाने वाली रिपोर्ट, रेड्डी-शुभेंदु का भी नाम
August 18, 2026
देश में मौजूदा और पूर्व सांसदों-विधायकों पर कुल 4,192 आपराधिक मामले में लंबित हैं. यह चौंकाने वाला आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट में सामने आया है. सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों के तेज निपटारे की मांग पर सुनवाई से पहले मामले यह रिपोर्ट एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने दाखिल की है.
बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की इस याचिका में सांसदों-विधायकों के आपराधिक मुकदमों का निपटारा 1 साल के भीतर करने की मांग की गई है. याचिका में यह भी कहा गया है अगर कोई नेता आपराधिक मामले में दोषी पाया जाता है, तो उसके चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगनी चाहिए. इसी मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट बनाने का आदेश दिया था.
मामले में बतौर एमिकस क्यूरी कोर्ट की सहायता कर रहे वरिष्ठ वकील हंसारिया ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में बताया है कि लोकसभा के कुल 543 सांसदों में से 251 सांसदों पर क्रिमिनल केस चल रहे हैं. इनमें से 170 पर ऐसे गंभीर आरोप हैं, जिनमें 5 साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान है. राज्यसभा के 233 में से 75 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 40 पर बेहद संगीन आरोप हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के 28 राज्यों में से 14 मुख्यमंत्रियों पर केस दर्ज हैं. सबसे ज्यादा 89 मामले तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी पर दर्ज हैं. उनके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी हैं, जिनके खिलाफ 29 केस हैं. इसके बाद नंबर है कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के एन चंद्रबाबू नायडू हैं. दोनों पर 19-19 केस हैं.
हलफनामे में जनप्रतिनिधियों के मुकदमों की धीमी रफ्तार पर भी चिंता जताई गई है. एमिकस क्यूरी ने बताया है कि इस तरह के 519 मामले 10 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं. 754 मामले 5 से 10 साल से लंबित हैं और 562 मामले 3 से 5 साल से लंबित हैं. 1,095 मामले ऐसे हैं जो 3 साल से कम समय से लंबित हैं. साल 2025 में जहां 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, वहीं 1,050 नए केस भी दर्ज हो गए.
मामलों की सुनवाई तेजी से करने के लिए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सांसदों और विधायकों के लिए बनी विशेष अदालतों में सिर्फ इन्हीं के मामलों की सुनवाई हो. जो केस 3 साल से ज्यादा समय से अटके पड़े हैं, उनकी सख्त मॉनिटरिंग की जाए और एक तय समय सीमा के भीतर उनका फैसला सुनाया जाए.
