लखनऊः गरीबों की खिदमत और गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूत करना हमारा मकसद- सैयद मोहम्मद असद नवाब
August 22, 2026
लखनऊ। कभी अवध की राजधानी के तौर पर मशहूर लखनऊ की पहचान आज भी अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और नवाबी विरासत से जुड़ी हुई है। इसी शाही विरासत और अपने बुजुर्गों की रवायत को आगे बढ़ाने की बात करते हुए अवध की रॉयल फैमिली से ताल्लुक रखने वाले सैयद मोहम्मद असद नवाब ने गरीबों और जरूरतमंदों की खदिमत को अपना मकसद बताया है। मोहम्मद अली शाह बादशाह की तीसरी पुश्त से ताल्लुक रखने वाले सैयद मोहम्मद असद नवाब का कहना है कि उनके बुजुर्गों ने मुश्किल दौर में अवाम की मदद के लिए बड़े इमामबाड़े, रूमी दरवाजा और कई तारीखी इमारतें तामीर कराईं। उनके मुताबिक नवाबी दौर में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के मजहबी मकामात और जरूरतमंदों की मदद को अहमियत दी गई, जिससे लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूती मिली। असद नवाब का कहना है कि उनके बुजुर्गों ने कब्रिस्तान, इमामबाड़े और इबादतगाहें तामीर कराने के साथ-साथ मंदिरों की भी मदद की। इसी रवायत को आगे बढ़ाते हुए वह आज भी मजहबी मकामात पर जरूरत के मुताबिक सहूलियतें मुहैया कराने और गरीबों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह धार्मिक स्थलों पर कूलर समेत जरूरी सामान उपलब्ध कराने और जरूरतमंदों की हर मुमकिन मदद करने के लिए आगे आते रहेंगे।असद नवाब अब पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने की बात भी कह रहे हैं। उनका कहना है कि अगर अवाम का प्यार और भरोसा मिला तो गरीबों के लिए अस्पताल, स्कूल और आवास की सहूलियत मुहैया कराने की कोशिश करेंगे। गरीब बच्चों को मुफ्त तालीम, जरूरतमंदों को मुफ्त इलाज और गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में मदद करना उनके एजेंडे में शामिल है। उन्होंने कहा, “गरीबों की मदद करना हमारे बुजुर्गों की रवायत रही है और हम उसी रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं। मेरे बुजुर्गों ने कब्रिस्तान बनवाए, इमामबाड़े बनवाए और मंदिरों की भी मदद की। मैं भी उसी रास्ते पर चलकर अवाम की खदिमत करना चाहता हूं।” असद नवाब ने कहा कि वह उन लोगों में शामिल नहीं होना चाहते जो अवाम से वादे करके बाद में अपने वादों को भूल जाते हैं। उनका कहना है, “मैं सिर्फ वादे नहीं करना चाहता, बल्कि काम करना चाहता हूं। मैं नेता बनकर नहीं, बल्कि अवाम का भाई बनकर उनकी खदिमत करना चाहता हूं।” उन्होंने कहा कि लखनऊ की भाईचारे, मोहब्बत और गंगा-जमुनी तहजीब को बरकरार रखने और उसे और मजबूत करने के लिए समाज के हर तबके को साथ लेकर चलना जरूरी है।
