लखनऊ। राजधानी के नगर निगम स्थित आरआर (केंद्रीय कार्यशाला) विभाग में नियम-कायदों को ताक पर रखकर मनमर्जी का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। इस पूरे खेल के केंद्र में हैं जूनियर इंजीनियर (जेई) शोएब अख्तर, जिन पर ठेकेदारों के भुगतान में अवैध कटौती और श्खातिरदारीश् न होने पर फाइलों को दबाने के बेहद संगीन आरोप लगे हैं।
ताजा मामला नगर निगम के निर्माण कार्यों से जुड़ा है। आरोप है कि यूपी कंस्ट्रक्शन से जुड़ी करीब ₹19 हजार की फाइल को जेई शोएब अख्तर ने अपनी कलम की श्जादूगरीश् से घटाकर सीधे ₹12 हजार कर दिया। इसी तरह श्काव्याश् नाम की फर्म ने भी गंभीर आरोप लगाते हुए खुलासा किया है कि यदि फाइल पास कराने से पहले श्व्यवस्थाश् न की जाए, तो छोटी से छोटी रकम पर भी बेवजह कैंची चला दी जाती है।
विभागीय गलियारों में सिर्फ रिश्वतखोरी ही नहीं, बल्कि जेई की नियुक्ति पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों की मानें तो शोएब अख्तर का मूल कार्यक्षेत्र श्विद्युतश् (इलेक्ट्रिकल) विभाग है, तो फिर उन्हें श्मैकेनिकलश् कार्य देखने की खुली छूट किस अधिकारी के शह पर दी गई? किस सरकारी आदेश के तहत यह दोहरा प्रभार सौंपा गया, इसकी जवाबदेही तय होना बाकी है।
यह कोई पहला मामला नहीं है। चर्चा है कि इससे पहले भी मनोज प्रभात तक इस भ्रष्टाचार की शिकायतें पहुंची थीं, लेकिन मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। शह मिलते ही जेई के हौसले इतने बुलंद हो गए कि दो दिन पहले विभाग में ही भुगतान को लेकर ठेकेदार और जेई के बीच तीखी नोकझोंक और गाली-गलौज तक की नौबत आ गई।
नगर आयुक्त गौरव कुमार लगातार प्रशासनिक पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई की बात करते हैं। लेकिन उनके ही नाक के नीचे आरआर विभाग में चल रहा यह श्कटौती का खेलश् उनकी कार्यशैली को सीधी चुनौती दे रहा है।बड़ा सवाल क्या नगर निगम में भुगतानों का फैसला सरकारी मानकों और मापों से होगा, या फिर किसी जेई के श्व्यक्तिगत लिफाफेश् की साइज पर?
अब देखना यह होगा कि नगर आयुक्त इस मामले में निष्पक्ष जांच कराकर भ्रष्ट तंत्र पर कड़ा प्रहार करते हैं या फिर जांच के नाम पर कागजी खानापूरी की जाएगी।
