बोले-ओबीसी नेतृत्व, टिकट और आरक्षण में दबंग जातियों का वर्चस्व; पाल, प्रजापति, सैनी, कश्यप, विश्वकर्मा, सैन-सविता, नंदवंशी, निषाद और अन्य दस्तकार समाजों को मिले वास्तविक हिस्सेदारी
विधान केसरी न्यूज नेटवर्क
लखनऊ/भोपाल। जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं विधान केसरी के सम्पादक विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ ने आरोप लगाया है कि देश के प्रमुख राजनीतिक दल अतिपिछड़ी और परंपरागत दस्तकार जातियों को अलग-अलग प्रकोष्ठों, मोर्चों और सामाजिक समितियों में बांटकर उनके वोट तो प्राप्त करते हैं, लेकिन मुख्य संगठन, टिकट वितरण और सत्ता के निर्णायक पदों से उन्हें दूर रखते हैं।
उन्होंने कहा—
“पाल, प्रजापति, सैनी, कश्यप, विश्वकर्मा, सैन-सविता, नंदवंशी, श्रीवास, निषाद, मल्लाह, बारी, चौरसिया और अन्य अतिपिछड़ी जातियों के वोट से सरकारें बनती हैं, लेकिन ओबीसी नेतृत्व और टिकट वितरण में बार-बार कुछ प्रभावशाली जातियों को ही प्राथमिकता दी जाती है। अतिपिछड़ों को प्रकोष्ठों का झुनझुना नहीं, मुख्य संगठन और सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए।”
विनेश ठाकुर ने स्पष्ट किया कि यह स्थिति केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। भाजपा और समाजवादी पार्टी सहित कई दलों में ओबीसी प्रतिनिधित्व के नाम पर अपेक्षाकृत प्रभावशाली जातियों के नेताओं को आगे कर दिया जाता है, जबकि छोटी और बिखरी अतिपिछड़ी जातियां केवल वोट जुटाने की जिम्मेदारी निभाती रहती हैं।
उन्होंने बसपा का उल्लेख करते हुए कहा कि बहुजन समाज पार्टी सामान्यतः जातियों के नाम पर इस प्रकार के अलग-अलग प्रकोष्ठ बनाने के बजाय बहुजन संगठन के साझा ढांचे पर जोर देती रही है। यह विनेश ठाकुर का राजनीतिक आकलन है; दलों की वर्तमान संगठनात्मक संरचना का तुलनात्मक विवरण अलग से सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
“अतिपिछड़ों का वोट निर्णायक, नेतृत्व किसी और के हाथ”
विनेश ठाकुर ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश सहित हिंदी भाषी राज्यों में अतिपिछड़ी और दस्तकार जातियों की संयुक्त राजनीतिक शक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालांकि इन सभी समुदायों की कुल जनसंख्या या मतदाता हिस्सेदारी का कोई एक आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, उन्होंने इसे करीब 40 प्रतिशत तक प्रभाव रखने वाला व्यापक सामाजिक समूह बताया।
उन्होंने सवाल किया—
“जब सरकार बनाने के लिए अतिपिछड़ों का वोट चाहिए, तो ओबीसी मोर्चे का नेतृत्व, संगठन की मुख्य जिम्मेदारियां और चुनावी टिकट भी उनकी आबादी के अनुपात में क्यों नहीं दिए जाते? क्या अतिपिछड़े केवल दूसरे नेताओं की रैलियों में भीड़ जुटाने और वोट दिलाने के लिए हैं?”
उन्होंने कहा कि ओबीसी समाज को एक समान समूह मानना ही बड़ी राजनीतिक भूल है। अन्य पिछड़ा वर्ग में कुछ जातियां लंबे समय से राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक रूप से मजबूत हैं, जबकि अनेक अतिपिछड़ी जातियों को आज भी विधानसभा, लोकसभा, नौकरशाही, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।
कांग्रेस नेतृत्व पर उठाए सवाल
विनेश ठाकुर ने कांग्रेस से पूछा कि उत्तर प्रदेश में यादव समाज का कितना वोट वास्तविक रूप से पार्टी को मिल रहा है और इसके मुकाबले पाल, प्रजापति, कश्यप, सैनी, विश्वकर्मा, सैन-सविता, नंदवंशी, निषाद, मल्लाह, बारी और चौरसिया समाजों को संगठन तथा टिकटों में कितनी हिस्सेदारी दी जा रही है।
वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हैं, जबकि पार्टी के आधिकारिक विवरण के अनुसार एआईसीसी ओबीसी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनिल जयहिंद हैं। इसलिए नामों और पदों को लेकर सार्वजनिक बहस में तथ्यात्मक स्पष्टता आवश्यक है।
विनेश ठाकुर ने कहा
“किसी एक प्रभावशाली ओबीसी जाति के नेता को पूरे पिछड़े और अतिपिछड़े समाज का प्रतिनिधि घोषित कर देना न्याय नहीं है। प्रत्येक समुदाय की अपनी सामाजिक स्थिति, समस्याएं और राजनीतिक आकांक्षाएं हैं।”
उन्होंने कांग्रेस से मांग की कि वह राष्ट्रीय, प्रदेश, जिला और विधानसभा स्तर पर अपने ओबीसी पदाधिकारियों तथा टिकट वितरण का जातिवार विवरण सार्वजनिक करे। कांग्रेस स्वयं अपने ओबीसी विभाग के माध्यम से अत्यंत पिछड़े और पसमांदा समुदायों को प्राथमिक प्रतिनिधित्व देने की बात करती रही है; अब उसे यह नीति संगठन और टिकट वितरण में दिखाई भी देनी चाहिए।
भाजपा पर भी अतिपिछड़ों की उपेक्षा का आरोप
विनेश ठाकुर ने भाजपा पर आरोप लगाया कि पार्टी अतिपिछड़ी जातियों का वोट लेकर ओबीसी राजनीति का नेतृत्व कुछ प्रभ…
