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मध्य प्रदेश कांग्रेस के 39 प्रकोष्ठों की सूची पर उठा जातिगत राजनीति का सवाल


विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ बोले—सभी दल स्पष्ट करें अपनी नीति और नीयत; सामाजिक प्रतिनिधित्व के नाम पर समाज को अलग-अलग खांचों में बांटना बंद हो

विधान केसरी न्यूज नेटवर्क

भोपाल/नई दिल्ली/लखनऊ। मध्य प्रदेश कांग्रेस के विभिन्न प्रकोष्ठों और सामाजिक समन्वय समितियों की एक सूची सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। सूची में झुग्गी-झोपड़ी, जनसमस्या निवारण, डॉक्टर एवं चिकित्सा, बुनकर, सफाई मजदूर, केश कला शिल्पी, दर्जी-सिलाई कला, मैकेनिक एवं ड्राइवर, शिक्षक, पर्यावरण, गौ-संरक्षण तथा मंदिर-पुजारी जैसे पेशेवर और सामाजिक प्रकोष्ठों के साथ कई समुदायों के नाम पर अलग इकाइयां भी दर्ज हैं।

‘समाज समन्वय प्रकोष्ठ’ के अंतर्गत बंगाली, बंजारा, तौलिक-साहू-राठौर, सर्व विश्वकर्मा, स्वर्णकला, कोली-कोरी और रजक समाज सहित विभिन्न समुदायों का उल्लेख होने से सवाल उठाया जा रहा है कि क्या यह वास्तविक प्रतिनिधित्व का प्रयास है या जातीय और सामुदायिक आधार पर वोट बैंक तैयार करने की राजनीतिक रणनीति?

जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं विधान केसरी के सम्पादक विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ ने सूची पर आपत्ति जताते हुए कांग्रेस सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से अपनी नीति और नीयत देश के सामने स्पष्ट करने की मांग की है।

उन्होंने कहा—

“राजनीतिक दल एक तरफ जातिवाद समाप्त करने और सामाजिक समरसता की बात करते हैं, जबकि दूसरी तरफ जातियों और समुदायों के नाम पर अलग-अलग प्रकोष्ठ बनाते हैं। यदि यह वास्तविक हिस्सेदारी है, तो इन समाजों को मुख्य संगठन, टिकट वितरण, विधानमंडल, सरकार, बोर्ड, निगम और नीति-निर्धारण में कितनी भागीदारी दी गई—इसका भी हिसाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए।”

पेशेवर संगठनों के साथ जातीय इकाइयों पर विवाद

सामने आई सूची में कुल 39 प्रकोष्ठों और समितियों का उल्लेख दिखाई देता है। इनमें पेशेवर, कल्याणकारी, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आधार पर गठित इकाइयां शामिल हैं।

प्रमुख प्रकोष्ठों में झुग्गी-झोपड़ी, सद्भावना एवं कौमी एकता, जनसमस्या निवारण, धार्मिक समन्वय, डॉक्टर एवं चिकित्सा, फुटकर एवं लघु व्यावसायिक समाज, गौ-संरक्षण एवं संवर्धन, बुनकर, सफाई मजदूर-कामगार, दर्जी एवं सिलाई, पर्यावरण, दिव्यांग, फेरीवाला, होटल एवं खिलौना, स्वरोजगार, मैकेनिक एवं ड्राइवर, शिक्षक, उपभोक्ता संरक्षण, उद्योग एवं व्यापार, किसान, विधि तथा मंदिर एवं पुजारी प्रकोष्ठ जैसे नाम शामिल हैं।

इसी सूची में समाज समन्वय के अंतर्गत कई जातीय और सामुदायिक इकाइयों का उल्लेख होने के कारण आलोचक इसे कांग्रेस की सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा बता रहे हैं।

कांग्रेस समर्थकों ने बताया समावेश का माध्यम

कांग्रेस से जुड़े लोगों का तर्क है कि अलग-अलग प्रकोष्ठ बनाना जातिवाद फैलाना नहीं, बल्कि उन समुदायों और पेशागत समूहों को संगठन से जोड़ना है, जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति में पर्याप्त अवसर नहीं मिलते।

समर्थकों का कहना है कि ऐसे प्रकोष्ठ संबंधित समाजों की समस्याएं पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाने, स्थानीय नेतृत्व तैयार करने और संगठनात्मक संवाद बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं।

हालांकि आलोचकों का सवाल है कि केवल नाम का प्रकोष्ठ बनाकर किसी समाज को सम्मानित नहीं माना जा सकता। वास्तविक प्रतिनिधित्व तब होगा, जब इन समुदायों के लोगों को प्रदेश और राष्ट्रीय कार्यकारिणी, चुनावी टिकट, राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा, मंत्रिमंडल, आयोग और बोर्ड-निगमों में प्रभावशाली स्थान मिलेगा।

“सभी जातियों के प्रकोष्ठ क्यों नहीं?”

सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि विभिन्न समाजों के नाम पर प्रकोष्ठ बनाना आवश्यक है, तो सभी जातियों और समुदायों के लिए समान व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

आलोचकों का कहना है कि चुनिंदा समाजों के नाम पर इकाइयां बनाकर उन्हें राजनीतिक रूप से साधने का प्रयास किया जाता है, जबकि वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने वाली समितियां कुछ प्रभावशाली समूहों के नियंत्रण में बनी रहती हैं।

विनेश ठाकुर ने कहा—

“यदि पार्टी जातीय पहचान के आधार पर प्रकोष्ठ बना रही है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि किन आधारों पर कुछ समाज चुने गए और शेष को बाहर रखा गया। सामाजिक न्याय चुनिंदा जातियों को चुनावी समय पर याद करने का नाम नहीं है।”

राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर भी पारदर्शिता की मांग

विनेश ठाकुर ने दावा किया कि ऐसी संगठनात्मक इकाइयां केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई राजनीतिक दलों की राष्ट्रीय और प्रदेश कमेटियों में जाति, धर्म, पेशे और सामाजिक समूहों के आधार पर प्रकोष्ठ बनाए जाते हैं।

उन्होंने मांग की कि भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अन्य सभी दल अपने संगठन की सामाजिक संरचना सार्वजनिक करें।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक दल को बताना चाहिए—

मुख्य कार्यकारिणी में किन सामाजिक वर्गों के कितने पदाधिकारी हैं, पिछले चुनावों में किन समुदायों को कितने टिकट दिए गए, निर्वाचित सांसदों-विधायकों और मंत्रियों की सामाजिक भागीदारी क्या है तथा आयोगों, बोर्डों और निगमों में किस वर्ग को कितनी हिस्सेदारी मिली है।

प्रकोष्ठ नहीं, मुख्य संगठन में भागीदारी चाहिए

जन सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि राजनीतिक दल अक्सर वंचित समाजों को अलग प्रकोष्ठ देकर संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं, लेकिन मुख्य संगठन और टिकट वितरण में प्रभावशाली हिस्सेदारी नहीं देते।

उन्होंने कहा—

“किसी जाति के नाम का प्रकोष्ठ बना देना राजनीतिक न्याय नहीं है। उस समाज का व्यक्ति प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव, संगठन महामंत्री, सांसद, विधायक और मंत्री क्यों नहीं बनता? समाज को अलग कमरे में बैठाकर मुख्य सत्ता से दूर रखना प्रतिनिधित्व नहीं, राजनीतिक छल है।”

उनका कहना है कि सामाजिक समन्वय की व्यवस्था तभी सार्थक होगी, जब उससे उभरने वाले नेतृत्व को मुख्यधारा के संगठन और चुनावी राजनीति में स्थान मिले।

सभी दलों को कटघरे में खड़ा किया

विनेश ठाकुर ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल जातियों और समुदायों को अलग-अलग सम्मेलन, मोर्चों, प्रकोष्ठों और मंचों में बांटकर वोट लेते हैं।

उन्होंने कहा—

“कांग्रेस हो, भाजपा हो या कोई क्षेत्रीय दल—सभी को देश के करीब डेढ़ सौ करोड़ नागरिकों के सामने अपनी नीति और नीयत रखनी चाहिए। वे जाति समाप्त करना चाहते हैं या जातियों का वोट बैंक बनाकर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं?”

उन्होंने राजनीतिक दलों से सामाजिक प्रतिनिधित्व का वार्षिक विवरण सार्वजनिक करने और संगठन तथा टिकटों में जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की।

प्रतिनिधित्व बनाम वोट बैंक की बहस

भारतीय राजनीति में सामाजिक समूहों और पेशागत समुदायों के लिए अलग संगठन बनाना कोई नई परंपरा नहीं है। राजनीतिक दल इसे जनसंपर्क, संगठन विस्तार और समावेशिता का माध्यम बताते हैं, जबकि विरोधी इसे वोट बैंक की राजनीति मानते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, विवाद का मुख्य प्रश्न प्रकोष्ठों का गठन नहीं, बल्कि यह है कि क्या इन इकाइयों को वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में अधिकार मिलता है या वे केवल चुनावी सक्रियता और भीड़ जुटाने तक सीमित रहती हैं।

यदि समाज आधारित प्रकोष्ठों से उभरने वाले लोगों को मुख्य संगठन, टिकट और सरकार में अवसर मिलता है, तो इसे प्रतिनिधित्व की दिशा में कदम माना जा सकता है। लेकिन यदि ये इकाइयां केवल नाम और प्रतीक तक सीमित रहें, तो जातिगत विभाजन और राजनीतिक उपयोग के आरोप मजबूत होते हैं।

विनेश ठाकुर का आह्वान

विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ ने सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से केवल जातीय प्रकोष्ठों के पदों से संतुष्ट न होने की अपील की।

उन्होंने कहा—

“समाज के नाम पर अध्यक्ष, संयोजक और प्रभारी बनने से आगे बढ़ना होगा। असली लड़ाई मुख्य संगठन, चुनावी टिकट, विधानसभा, संसद और सरकार में हिस्सेदारी की है। सभी दलों से लिखित नीति और वास्तविक प्रतिनिधित्व का हिसाब मांगिए।”

उन्होंने कहा कि देश को जातीय खांचों में बांटने के बजाय जनसंख्या के अनुपात में पारदर्शी हिस्सेदारी, समान अवसर और साझा नागरिक अधिकारों पर आधारित राजनीति की जरूरत है।

प्रमुख सवाल

  • क्या जाति आधारित प्रकोष्ठ वास्तविक प्रतिनिधित्व हैं या चुनावी वोट बैंक?
  • क्या इन समाजों को मुख्य कार्यकारिणी और टिकट वितरण में भी समान स्थान मिलता है?
  • राजनीतिक दल अपने संगठन की सामाजिक संरचना सार्वजनिक क्यों नहीं करते?
  • क्या अलग-अलग प्रकोष्ठ सामाजिक समन्वय बढ़ाते हैं या समाज को और अधिक बांटते हैं?

विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’ का संदेश

“प्रकोष्ठों का झुनझुना नहीं, मुख्य संगठन और सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी चाहिए। सभी राजनीतिक दल अपनी नीति, नीयत और सामाजिक प्रतिनिधित्व का हिसाब देश के सामने रखें।”

विनेश ठाकुर ‘कर्पूरी’

राष्ट्रीय अध्यक्ष, जन सेवा दल

सम्पादक, विधान केसरी, लखनऊ

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