लखनऊ। ष्शहर को चमकाओ, सफाई अपनाओष् की मुस्तैद नसीहतें बाँटने वाले लखनऊ कलेक्टरेट के साहिबान शायद अपने ही आँगन का रास्ता भूल गए हैं। श्स्वच्छ भारत अभियानश् के चमचमाते विज्ञापनों और होर्डिंग्स के ठीक पीछे छिपा कलेक्टरेट का असली चेहरा किसी आधुनिक श्स्मार्ट सिटीश् का ऐसा अनूठा नमूना पेश कर रहा है, जहाँ न्याय की गुहार लगाने आए फरियादियों का स्वागत जोरदार सड़ांध और बजबजाती नालियाँ करती हैं।
रोजाना हजारों लोग अपनी फरियादें लेकर इसी चैखट पर माथा टेकते हैं। पर न्याय मिलने में जितनी देर होती है, उससे कहीं तेज रफ्तार से बदबूदार हवा उनके नथुनों में प्रवेश कर जाती है। कलेक्टरेट की मुख्य इमारत के आगे तो चकाचैंध का पूरा स्वाँग रचा गया है, लेकिन जरा सा पीछे कदम बढ़ाते ही गंदगी का ऐसा श्मास्टरपीसश् दिखता है जिसे देखकर लगता है कि नगर निगम और जिला प्रशासन ने श्कचरा प्रबंधनश् का सारा भार अकेले इसी कोने पर छोड़ दिया है।
पूरे जिले और आसपास के कस्बों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने वाले बड़े-बड़े अफसर इसी बदबूदार दुर्व्यवस्था के बीच एसी कमरों में बैठकर श्स्वच्छता रैंकिंगश् सुधारने की नीतियाँ तैयार करते हैं। विडंबना देखिए कि जिन हाथों में शहर को चमकाने की कमान है, उनके खुद के घर का चिराग तले अँधेरा इतना घना है कि कूड़े के ढेर ऊँचे उठ रहे हैं और नालियों का पानी सड़कों पर श्स्मार्टश् बहकाव ले रहा है।
क्या यह वही नया श्स्मार्ट मॉडलश् है जहाँ विज्ञापनों पर लाखों स्वाहा कर दिए जाएँ और जमीनी हकीकत को कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाए? अफसरों के इस श्स्वच्छ रवैयेश् से तो यही लगता है कि जनहित की समस्याओं का स्थायी निवारण कागजों से बाहर निकल ही नहीं पा रहा। अब देखना यह है कि दूसरों को स्वच्छता का आईना दिखाने वाले अफसरों की नजर अपने ही परिसर की इस दुर्दशा पर कब पड़ती है, या फिर फरियादी यूँ ही बदबू के साए में न्याय की उम्मीद सँजोते रहेंगे।
