- सरकारी जवाब से मचा बवाल, पुलिस अभिलेखों में न आदेश, न निर्देश
- पीड़ित पक्ष ने दोषी अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई की बनाई रणनीति
पीलीभीत। पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष राजीव अग्रवाल को उनके आवास पर कथित रूप से नजरबंद (हाउस अरेस्ट) किए जाने का मामला अब नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ ले चुका है। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी में पुलिस विभाग द्वारा दिए गए आधिकारिक जवाब ने इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरटीआई के जवाब में स्वयं थाना कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक ने लिखित रूप से स्वीकार किया है कि उनके कार्यालय के अभिलेखों में किसी नागरिक को नजरबंद करने संबंधी कोई लिखित आदेश, निर्देश या कानूनी आधार उपलब्ध नहीं है।आरटीआई से मिले इस जवाब के बाद मामला तूल पकड़ता जा रहा है। पीड़ित पूर्व पालिका अध्यक्ष राजीव अग्रवाल का आरोप है कि उन्हें 22 जुलाई की रात 12रू45 बजे से 25 जुलाई की रात लगभग 8रू00 बजे तक बिना किसी वैधानिक आदेश के उनके ही आवास में पुलिस निगरानी में रखा गया। उनका कहना है कि इस दौरान उन्हें स्वतंत्र रूप से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।राजीव अग्रवाल की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता नीलेश चतुर्वेदी ने बताया कि आरटीआई के माध्यम से जब पुलिस से इस कार्रवाई का विधिक आधार पूछा गया तो विभाग कोई आदेश या सक्षम प्राधिकारी की अनुमति प्रस्तुत नहीं कर सका। उनका आरोप है कि जैसे ही पुलिस को यह एहसास हुआ कि आरटीआई के माध्यम से मामला सार्वजनिक होने वाला है, 25 जुलाई की रात को आनन-फानन में आवास पर तैनात पुलिस पहरा हटा लिया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि यदि किसी नागरिक की स्वतंत्रता सीमित की जाती है तो उसके लिए सक्षम मजिस्ट्रेट अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी का स्पष्ट लिखित आदेश होना आवश्यक है। जब पुलिस स्वयं स्वीकार कर रही है कि उसके पास ऐसा कोई आदेश उपलब्ध नहीं था, तब तीन दिनों तक किसी व्यक्ति को घर में रोके रखना प्रथम दृष्टया अवैध हिरासत और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला बनता है।
आरटीआई से प्राप्त सरकारी दस्तावेज को आधार बनाकर अब पीड़ित पक्ष दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी में जुट गया है। अधिवक्ता का कहना है कि संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कराने के लिए न्यायालय सहित अन्य सक्षम मंचों पर विधिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस मामले में प्रशासन क्या स्पष्टीकरण देता है और आगे क्या कार्रवाई होती है।
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