लखनऊ: सावन मास के अंतिम सोमवार को श्री बाबा भदेश्वर नाथ महादेव मंदिर में हुआ रुद्राभिषेक ! हर हर महादेव के नारों के साथ भक्तों ने भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर की पूजा अर्चना
August 24, 2026
लखनऊ। लखनऊ जिले के बख्शी का तालाब तहसील क्षेत्र विकासखंड के शिवपुरी गांव में पूर्व दिशा में स्थित प्राचीन कालीन श्री बाबा भदेश्वर नाथ शिव मंदिर शिवपुरी जिसका वर्णन शिवमहापुराण , स्कन्द पुराण आदि पौराणिक ग्रंथों व कथाओं में है। पवित्र सावन माह के अंतिम सोमवार को महारूद्राभिषेक का आयोजन राममोहन गुप्ता( पत्रकार)के द्वारा किया गया और भगवान भोलेनाथ भदेश्वर नाथ शिव भगवान का अभिषेक किया गया और मंदिर को फूलों से सजाया गया। जहां हर हर महादेव के नारों के साथ भक्तों ने भगवान शिव की पूजा अर्चना की। श्री बाबा भदेश्वर नाथ शिव मंदिर में बाणासुर की पुत्री ऊषा यहीं पर भगवान शिव से ज्ञान प्राप्त करने व पूजा अर्चना करने आती थी। कहा जाता है कि एक रात्रि ऊषा ने स्वप्न देखा जिसमें एक सुंदर व्यक्ति जिसे देखते ही ऊषा उस व्यक्ति पर मोहित हो गई और स्वप्न में ही उस व्यक्ति को अपना वर चुन लिया और सुबह अपनी सहेली चित्रलेखा से मिलीं और अपने स्वप्न की सारी कहानी चित्रलेखा को बताया और कहा कि चित्रलेखा उस व्यक्ति का चित्र बनाओ जो मेरे स्वप्न में आया था तो चित्रलेखा ने कई चित्र बनाए लेकिन कोई चित्र उनके स्वप्न वाले व्यक्ति से मेल नहीं खाते थे तब भगवान श्रीकृष्ण का चित्र बनाया तो ऊषा ने कहा कि कुछ ऐसा ही व्यक्ति था लेकिन ये है नहीं तो फिर अनिरुद्ध का चित्र बनाया तो ऊषा ने कहा कि बस बस ये ही वह व्यक्ति हैं जो स्वप्न में आया था तो चित्रलेखा ने बताया कि ये भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध है तो ऊषा ने कहा कि बस अब मुलाकात करवाओ तो चित्रलेखा रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण की नगरी पहुंच गई और अंदर जाने का प्रयास किया लेकिन नगरी की सुरक्षा भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अस्त्र सुदर्शन चक्र के हांथ में थी तो चित्रलेखा ने पीत वस्त्र (भगवान श्रीकृष्ण नामी) पहनकर व सुदर्शन चक्र को प्रणाम कर महल में प्रवेश कर लिया और अनिरुद्ध को पलंग समेत निद्रावस्था में लेकर निकल पड़ी और ऊषा के महल लेकर पहुंच गयी तो ऊषा ने कहा कि बस ये ही है जिन्हें मैंने स्वप्न में देखा था अनिरुद्ध को चेतना आयी और अनिरुध्द उठ बैठे और चैंक गए तभी ऊषा ने स्वप्न की सारी कहानी सुनाई और अनिरुध्द को ऊषा भी पसंद आयी और दोनों ने विवाह का निश्चय कर लिया और ऊषा ने अनिरुद्ध को अपने महल में में छिपा लिया बाणासुर अपनी पुत्री को कमल पुष्पों से प्रतिदिन तौलवाता था तो अचानक कमल पुष्प अधिक तुलाभार में चढ़ने लगे तो बाणासुर अचंभित हो गया और उसने तुरंत उषा के महल की जांच पड़ताल करवायी जहां अनिरुद्ध मिले ये जैसे ही बाणासुर को पता चला कि अनिरुद्ध भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र है तो बाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया और युद्ध का संदेश भगवान श्रीकृष्ण को भेज दिया बाणासुर भगवान भोलेनाथ का परम भक्त था जिसने भगवान शिव से अनेक वरदान प्राप्त किए थे जिसके कारण वह अजेय बलवान बन गया था जहां वह इधर-उधर युद्ध करने के लिए भटकने लगा और कहने लगा कि हमारी भुजाओं में युद्ध करने की खुजली बढ़ती जा रही है उसने जहां जहां युद्ध किए सब युद्ध उसने जीते और उसमें अहंकार अधिक होने लगा तभी वह भगवान शिव के पास पहुंचा और कहा कि भगवान मुझे युद्ध प्रदान करो या योद्धा तो भगवान शिव ने बाणासुर एक ध्वजा दिया कि इसको अपने महल पर लगाओ जाकर जिस दिन यह ध्वज झुक जाये तो उस दिन समझ लेना कि अजेय योद्धा आ चुका है और अनिरुध्द के आने से वह ध्वज झुक गया जो बाणासुर को पता चला, भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर से युद्ध करने चल पड़े और बाणासुर की राजधानी शोणितपुर पहुंच गए जहां बाणासुर को युद्ध करने के लिए ललकारा और बाणासुर युद्ध करने आया दोनों के बीच भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ दोनों ही ओर से भयानक से भी भयानक अस्त्रों से भीषण युद्ध हुआ तभी बाणासुर ने भगवान श्रीकृष्ण पर १०८ फीट लंबी शिला का प्रहार किया और भगवान श्रीकृष्ण ने उस शिला को अपने अस्त्र से खंडित कर दिया जिसके अवशेष श्री बाबा भदेश्वर नाथ शिव मंदिर परिसर में तथा रण बाबा मंदिर परिसर में (मंदिर के चबूतरे में रखें है)तथा मुक्तेश्वर महादेव मंदिर परिसर देवरी रूखारा में आज भी सुरक्षित रखें है बाणासुर की भुजाएं भगवान श्रीकृष्ण काटने लगे जब अंत में दो ही भुजाएं शेष बची तो बाणासुर व्याकुल हुआ और भगवान भोलेनाथ शिव भगवान से रक्षा करने की प्रार्थना की भोलेनाथ प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र को रोक दिया और बाणासुर को भगवान शिव ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही भगवान विष्णु के अवतार हैं और इन्हें पहचानों वत्स बाणासुर ये भगवान विष्णु हैं इनसे कभी भी कोई युद्ध नहीं जीत सकता तुम भगवान से युद्ध करने चले हो तो बाणासुर ने भगवान भोलेनाथ के आदेश से युद्ध समाप्त करने की प्रार्थना भगवान श्रीकृष्ण से की और बाणासुर ने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर को क्षमा कर दिया और बाणासुर ने ऊषा और अनिरुध्द के विवाह की मंजूरी दी कि विवाह बड़े हर्ष और धूमधाम से ऊषा और अनिरुध्द का हुआ आज वर्तमान में जहां बख्शी का तालाब थाना बना है वहां कभी बाणासुर का किला हुआ करता था और शोणितपुर राजधानी हुआ करती थी जो आज सोनिकपुर (पालपुर) के नाम से प्रसिद्ध हुआ करती थी जिस क्षेत्र में बाणासुर और भगवान श्रीकृष्ण के बीच भीषण युद्ध हुआ था वह क्षेत्र रण बाबा मंदिर क्षेत्र (रण क्षेत्र) में हुआ था जिसे आज के समय में बिशहर के नाम से जाना जाता है कहा जाता है कि इस रण क्षेत्र में भीषण दलदल हो गया था जहां पानी तेरा रहा था और जहां पैर पटकने मात्र से अजीब कंपन होता था जो किई किलोमीटर दूर उसकी धमक सुनाई पड़ती (महसूस) होती थी रण क्षेत्र में स्थित प्राचीन कालीन पेड़ व मंदिर रणबाबा के नाम से प्रसिद्ध है जहां अपनी मनोकामनाओ की पूर्ति हेतु भक्तगण पूजा अर्चना करने आते हैं श्रीबाबा भदेश्वर नाथ शिव मंदिर परिसर में एक प्राचीन कालीन कुंआ बना है जो बहुत गहरा है तथा मंदिर के उत्तर दिशा के खेतों में आज भी नगर होने के प्रमाण के रूप में घड़े, दीपक देली,कलश, ईंटें आज भी आकर्षण का केंद्र है यहां दिव्य बेलपत्र का पेड़ लगा है जो अद्भुत है मंदिर परिसर से थोड़ी दूर पर एक कुंड है जो लगभग १५ से २० वर्ष पहले अपने आप ही जल निकलता था जो सीधे गोमती नदी में मिल जाता था जो प्रतिदिन प्रवाहित होता था जिसका प्रयोग गांव के लोग पीने के लिए,खाना बनाने के लिए प्रयोग में लाते थे जिसे सोतवा के नाम से जाना जाता है तथा कहानियों में इस जल स्रोत को गौतमी नदी के नाम से जाना जाता था कहा जाता है कि यहां शिर्फ भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती ही है अन्य कोई गण नहीं हैं यहां कजरी तीज के अवसर पर विशाल मेरे का आयोजन आदि काल से होता आ रहा है सावन के पावन महीने में भक्तों के द्वारा और महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर महारुद्राभिषेक का आयोजन भक्तों के द्वारा करवाया जाता है यहां दूर दराज से भक्तगण पूजा अर्चना करने आते हैं यहां अद्भुत मन शांति मिलती है तथा यहां हर महीने में एक बार रामचरितमानस पाठ का आयोजन और हर महीने के प्रत्येक मंगलवार को सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया जाता है।
