लखनऊ। कहते हैं कि सरकारी विभागों में अगर श्सेटिंगश् पक्की हो, तो नियम-कानून ताक पर रख दिए जाते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा लखनऊ के जल संस्थान और नगर निगम में देखने को मिल रहा है। जहां एक तरफ नगर निगम के श्सक्रियश् कर्मचारी शहर में बीजेपी के होर्डिंग्स और झंडों को कचरा गाड़ी में भरकर अपनी मुस्तैदी का ढिंढोरा पीट रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विभाग के नाक के नीचे चल रहे एक बड़े जालसाजी और धोखाधड़ी के खेल पर पर्दा डालने में अफसरों को कोई शर्म महसूस नहीं हो रही।
मामला जल संस्थान में अनुकंपा के आधार पर मिली एक श्फर्जीश् नौकरी का है, जहां नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ाई गईं कि देखने वाले भी हैरान हैं। पीड़ित कैंसर पीड़ित बुजुर्ग मां श्रीमती प्रमिला (50 वर्ष), जो अपने दिवंगत पति स्व. रामाश्रय राम (पूर्व कर संचयक) की मौत के बाद न्याय की गुहार लगा रही हैं, उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजकर जल संस्थान और नगर निगम के अफसरों की मिलीभगत की पोल खोलकर रख दी है।
मृतक आश्रित नियमावली 1974 के तहत अनुकंपा नियुक्ति की पहली शर्त यह होती है कि नौकरी पाने वाला व्यक्ति मृतक के परिवार और बुजुर्ग मां-बाप का भरण-पोषण करेगा। लेकिन बड़े बेटे मृत्युंजय ने अनुकंपा पर नौकरी मिलते ही अपनी कैंसर पीड़ित मां को इलाज कराने से साफ मना कर दिया और उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। प्रताड़ना इस कदर बढ़ी कि मां को 2017 में अपने ही कुपुत्र से संबंध विच्छेद कर बेदखल करना पड़ा। जिस बेटे को पिता की जगह सहारा बनने के लिए नौकरी दी गई थी, वही मां के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया।
शिकायत के मुताबिक, अनुकंपा नौकरी हथियाने के लिए मृत्युंजय ने विभाग को पूरी तरह अंधेरे में रखा। उस पर नियुक्ति से पूर्व ही लड़की छेड़ने और उत्पीड़न का गंभीर आपराधिक मुकदमा दर्ज था, जिसे उसने हलफनामे में साफ छिपा लिया। सुप्रीम कोर्ट (अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 2016) का स्पष्ट आदेश है कि तथ्य छिपाने और धोखाधड़ी पर नौकरी स्वतः निरस्त मानी जाएगी। लेकिन जल संस्थान के मेहरबान अफसरों ने न तो सही पुलिस सत्यापन की सुध ली और न ही हलफनामे की पड़ताल की।
धोखाधड़ी का सिलसिला यहीं नहीं थमा। दिवंगत कर्मचारी की पत्नी के नाम से वर्ष 2008 में सरकार द्वारा आवंटित राशन कोटा था, जिससे परिवार का जीवन यापन होता था। पति की मृत्यु के बाद सदमे में डूबी मां की मनोरोगी दशा का फायदा उठाकर बेटे ने राशन कोटे और पारिवारिक आय के तथ्यों को छिपाकर हलफनामा बनवा लिया। विभाग ने भी बिना किसी भौतिक सत्यापन के इस फर्जीवाड़े पर अपनी आंखें मूंद लीं।
चैंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2023 में नगर निगम समिति और मुख्य नगर लेखा परीक्षक द्वारा इस नियुक्ति को नियमों के विपरीत पाए जाने के बावजूद भी मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। शिकायती पत्र में सीधे तौर पर महाप्रबंधक कुलदीप सिंह, सचिव धर्मेंद्र सत्संगी, लेखाधिकारी पंकज सोती और नगर आयुक्त गौरव कुमार (प्।ै) जैसे शीर्ष अधिकारियों की मिलीभगत और संरक्षण का आरोप लगाया गया है। जांच के नाम पर महज खानापूर्ति की गई और आरोपी कर्मचारी पर कार्रवाई करने के बजाय उसे पदोन्नति की सौगात दे दी गई !
एक तरफ नगर निगम की टीम सड़कों पर होर्डिंग्स हटाने के नाम पर हाई-प्रोफाइल हंगामा खड़ा कर रही है, और दूसरी तरफ अपनी ही नाक के नीचे एक असहाय, कैंसर पीड़ित मां के हक पर डाका डालने वाले कर्मचारी और भ्रष्ट अफसरों पर मेहरबानी बरसा रही है। अब पीड़ित मां ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए इस फर्जी नियुक्ति को तत्काल निरस्त करने, आरोपी बेटे पर एफआईआर दर्ज कराने और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
क्या बुलडोजर नीति के लिए मशहूर यूपी सरकार का हंटर जल संस्थान के इन मेहरबान अफसरों और जालसाज कर्मचारी पर चलेगा, या फिर सरकारी फाइलें यूं ही भ्रष्टाचार की धूल फांकती रहेंगी?।
