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पीलीभीतः दोषी सचिव पर अब तक नहीं गिरी गाज! मरौरी ब्लॉक में निलंबन फाइल दबने से उठे बड़े सवालः जिलाधिकारी के हस्तक्षेप से मचा हड़कंप


हैंडपंप रीबोर घोटाले में वित्तीय अनियमितता की जांच में दोषी पाए गए ग्राम पंचायत अधिकारीके खिलाफ एक माह बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

पीलीभीत। जनपद के मरौरी विकास खंड में तैनात ग्राम पंचायत अधिकारी मनोरंजन सिंह के खिलाफ हैंडपंप रीबोर एवं मरम्मत कार्यों में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बावजूद अब तक निलंबन की कार्रवाई न होने से विकास भवन के अधिकारियों की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी कार्रवाई लंबित रहने से प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सचिव के निलंबन की संस्तुति करते हुए तैयार की गई फाइल करीब एक माह पहले वरिष्ठ अधिकारियों के पास भेज दी गई थी। इसके बावजूद आज तक निलंबन का आदेश जारी नहीं किया गया। मामले के सार्वजनिक होने और जिलाधिकारी के संज्ञान लेने के बाद विकास भवन से लेकर ब्लॉक स्तर तक प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है।

बताया जा रहा है कि ग्राम पंचायत अधिकारी मनोरंजन सिंह पिछले लगभग चार वर्षों से मरौरी ब्लॉक में तैनात हैं। इस दौरान उनके खिलाफ विकास कार्यों में अनियमितताओं, सरकारी धन के दुरुपयोग तथा वित्तीय गड़बड़ियों से संबंधित कई शिकायतें सामने आती रही हैं। इनमें सबसे गंभीर मामला हैंडपंप रीबोर और मरम्मत कार्यों के नाम पर लाखों रुपये के कथित फर्जी भुगतान का है।सूत्रों के अनुसार जांच में कई कार्यों में नियमों की अनदेखी, अभिलेखों में विसंगतियां तथा भुगतान प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद संबंधित अधिकारी को दोषी मानते हुए निलंबन की संस्तुति की गई थी। इसके बावजूद कार्रवाई में हो रही देरी ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जांच पूरी हो चुकी है और निलंबन की संस्तुति भी हो चुकी है, तो आखिर किसके संरक्षण में कार्रवाई रोकी जा रही है? क्या दोषी अधिकारी को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर कोई अन्य कारण है? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी अधिकारी के पास नहीं है।

जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद माना जा रहा है कि मामले में जल्द ही कोई बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया जा सकता है। वहीं विकास भवन की कार्यप्रणाली पर भी निगाहें टिक गई हैं। यदि दोषी पाए गए अधिकारियों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ शासन की जीरो टॉलरेंस नीति पर भी सवाल उठना स्वाभाविक होगा।

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