आगरा। ताजमहल के आसपास प्रतिबंधित क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण और भूमि की स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका (च्प्स्) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विपक्ष के वकीलों जमकर फटकार लगाकर
संबंधित विभागों से जवाब तलब किया है। मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी एवं माननीय न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने की।
याचिका में मांग की गई है कि ताजमहल के प्रतिबंधित क्षेत्र की भूमि को पुनः संरक्षित स्थिति में लाया जाए, जैसा कि प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 की धारा 20-ए में प्रावधानित है।
सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (।ैप्) की ओर से कोर्ट को बताया गया कि केंद्रीय संरक्षित स्मारकों के चारों ओर 100 मीटर क्षेत्र प्रतिबंधित तथा उसके आगे 200 मीटर क्षेत्र निर्माण गतिविधियों के लिए विनियमित घोषित है। साथ ही बताया गया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1998 में ताजमहल से 500 मीटर के दायरे में किसी भी निर्माण गतिविधि पर रोक लगाने का आदेश दिया था।
।ैप् की ओर से यह भी अवगत कराया गया कि बिना अनुमति निर्माण के मामलों में एफआईआर दर्ज और कारण बताओ नोटिस के कार्यवाही के नाम से गुमराह किया है तथा आवश्यकता पड़ने पर ध्वस्तीकरण के आदेश की बात बताई गई लेकिन पिछले कई सालो से कोइ ध्वस्टीकरण नहीं किया गया भले ही यह कार्यवाही उच्च स्तर द्वारा की जाती है लेकिन बिना मालिकाना हक जैसे असद गली मे हो रहे निर्माण की.जिम्मेदारी विभाग की थी जिसमे विभाग ने आज तक असद गली मे हुए निर्माण के ध्वस्टिकरण की कार्यवाही आज तक नहीं हुई यही कारण है रहा की जिम्मेदार अपने विभाग और हाईकोर्ट को आज तक गुमराह कर रहा है अवैध निर्माणों को हटाने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की बताकर पल्ला झाड़ते नजर आ रहे
हाईकोर्ट ने मामले में सभी संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कहा गया है कि जवाब में यह भी स्पष्ट किया जाए कि ।ैप् के नोटिसों पर क्या कार्रवाई की गई। नोटिस के कार्यवाही न करने के पीछे क्या वजह रही,जिम्मेदारो ने प्रशाशन को कितने मकानों को गिराने के लिए लिखा है यह सभी स्पष्ट किया जाये,मामले की अगली सुनवाई 06 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है
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