लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार के आईजीआरएस (जनसुनवाई) पोर्टल को लेकर मुख्यमंत्री भले ही सख्त हों, लेकिन लखनऊ का स्वास्थ्य महकमा इसे मजाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।
ताजा मामला टीबी सह संयुक्त चिकित्सालय, ठाकुरगंज से सामने आया है, जहाँ निष्पक्ष जांच के बुनियादी सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाते हुए आरोपी अस्पताल प्रशासन ने खुद ही जांच अधिकारी की भूमिका निभा डाली और अपनी रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की सिफारिश कर दी।
पारा निवासी पीड़ित राजकुमार ने आईजीआरएस पोर्टल (संदर्भ संख्या- 20015720616698) पर शिकायत दर्ज कराई थी कि ठाकुरगंज अस्पताल के स्टाफ द्वारा मृतका (उनकी माता जी लीलावती) के परिजनों को प्रताड़ित किया गया और मृत्यु प्रमाण पत्र में गंभीर त्रुटियां (आयु 61 वर्ष की जगह 60 वर्ष और पते में गलतियां) की गईं।
अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आनंद त्रिपाठी द्वारा मुख्य चिकित्सा अधिकारी लखनऊ को भेजी गई आख्या (पत्र संख्या- लो०शि०ध्आई०जी०आर०एस०ध्2026-27ध्1127, दिनांक 17ध्06ध्2026) पर गौर करें तो पूरी कहानी साफ हो जाती है। जिस स्टाफ और अस्पताल पर गंभीर आरोप थे, उसी अस्पताल के मुखिया ने सारा दोष एक डॉक्टर (डॉ. दीपा शर्मा) के श्रोगी पत्रकश् पर मढ़कर औपचारिकता पूरी कर ली।
हैरानी की बात यह है कि जिस पीड़ित को न्याय के लिए भटकना पड़ा, उसके बारे में आख्या में दावा कर दिया गया किकृ ष्शिकायतकर्ता श्री राजकुमार संतुष्ट हैं। अतः इस शिकायती संदर्भ को निक्षेपितध्निस्तारित करने का कष्ट करें।ष्
पहला सवाल यह उठता है जब शिकायत ठाकुरगंज चिकित्सालय के स्टाफ और वहां के रवैये के खिलाफ थी, तो सीएमओ लखनऊ ने उसी अस्पताल के प्रशासन से आख्या क्यों मांगी ? दूसरा सवाल अगर पीड़ित संतुष्ट नही है तो जबरदस्ती संतुष्टि का हवाला क्यो दिया जा रहा है । तीसरा सवाल क्या लखनऊ के उच्च स्वास्थ्य अधिकारी ऐसी श्मैनेज्डश् आख्याओं को आंख मूंदकर स्वीकार करते रहेंगे, या धरातल पर जाकर जनता की प्रताड़ना का सच देखेंगे ?
पीड़ित ने अब इस मामले को लेकर उच्च अधिकारियों और शासन स्तर पर आवाज उठाने का मन बनाया है। देखना यह होगा कि खुद ही आरोपी और खुद ही जांचकर्ता बनने वाले इस सिस्टम पर शासन क्या कार्रवाई करता है या फिर कागजों के पुलिंदे के नीचे इस गरीब की चीख को हमेशा के लिए दबा दिया जाएगा।
