Type Here to Get Search Results !
BREAKING NEWS

लखनऊः क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट का खुला उल्लंघन! स्वास्थ्य अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल


लखनऊ। अभी बाराबंकी के नवनियुक्त मुख्य चिकित्साधिकारी को उनके ही स्टाफ द्वारा रेड कारपेट वेलकम देने पर जिलाधिकारी बाराबंकी ने जांच के आदेश दे दिए है मामला थमा ही था कि लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी एवं डिप्टी सीएमओ पर बिना पंजीकृत अस्पताल मे एक मरीज की मौत हो जाने के वावजूद उस अस्पताल का पंजीकरण करना उनकी कार्यशाली पर सवालिया निशान लगाता है। 

मामला राजधानी  के दुबग्गा स्थित श्किसान अस्पतालश् (अंधे की चैकी) में डॉक्टरों की भारी लापरवाही और अमानवीय कृत्य का एक संदिग्ध मामला सामने आया है, जहां सड़क दुर्घटना में घायल एक 18 वर्षीय युवक सूरज की इलाज के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। मृतक के पिता ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी  को लिखित शिकायत सौंपकर अस्पताल प्रशासन और संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है। यह मामला सीधे तौर पर श्क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्टश् के नियमों की धज्जियां उड़ाता नजर आ रहा है।

हरदोई जनपद के थाना बघौली अंतर्गत ग्राम गहरैया खेड़ा के निवासी महेश ने आरोप लगाया है कि उनके 18 वर्षीय पुत्र सूरज का एक्सीडेंट में दाहिना पैर टूट गया था। हरदोई के शांति कुटी अस्पताल से प्राथमिक उपचार के बाद उसे बेहतर इलाज के लिए 13 अप्रैल 2026 को दुबग्गा स्थित श्किसान अस्पतालश् में भर्ती कराया गया था। भर्ती के वक्त अस्पताल ने तुरंत ₹27,000 जमा करवाए।

पीड़ित पिता के अनुसार, 14 अप्रैल को मरीज का एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड कराने के बाद ऑपरेशन के नाम पर पुनः ₹70,000 की मोटी रकम वसूली गई। गंभीर आरोप है कि किसान अस्पताल ने युवक का ऑपरेशन अपने परिसर में न कराकर, रात के अंधेरे में किसी अन्य अज्ञात अस्पताल में ले जाकर कराया। ऑपरेशन के बाद मरीज को वापस तो लाया गया, परंतु परिजनों को उससे मिलने नहीं दिया गया।15 अप्रैल की सुबह अस्पताल प्रशासन ने बताया कि युवक की मौत हो चुकी है। पीड़ित पिता का आरोप है कि मौत के बाद शव देने के लिए अस्पताल प्रशासन ₹54,000 की अतिरिक्त मांग कर रहा था और पैसे न देने पर पुलिस से एफआईआर कराने व शव न सौंपने की धमकी दे रहा था। अंततः ₹2,500 की और व्यवस्था करने के बाद ही अस्पताल ने शव परिजनों के सुपुर्द किया। 

कानूनी विशेषज्ञों और क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के प्रावधानों के अनुसार, यह मामला अस्पताल के पंजीकरण को रद्द करने और डॉक्टरों पर आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है। एक्ट के तहत हर मरीज और उसके परिजनों को बीमारी, उपचार की स्थिति और किए जा रहे मेडिकल प्रोसीजर की पूरी जानकारी पाने का अधिकार है। परिजनों को बिना बताए रात में दूसरे अस्पताल शिफ्ट करना और उनसे जानकारी छुपाना कानूनन अपराध है। क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देशों के अनुसार, कोई भी अस्पताल बकाया बिल के भुगतान के नाम पर मरीज के शव को बंधक नहीं बना सकता। ऐसा करना पूरी तरह गैर-कानूनी और दंडनीय है। मरीज का ऑपरेशन किस डॉक्टर ने किया, किस एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की देखरेख में हुआ, और उसे दूसरे अस्पताल क्यों ले जाया गयाकृइन सभी तथ्यों को छुपाना एक्ट के तहत तय श्मानक संचालन प्रक्रियाश् (ैव्च्) का खुला उल्लंघन है।

जब इस बाबत डिप्टी सीएमओ अखंड परताप सिंह से जानकारी ली गई तो उन्होंने पहले टालमटोल करने का प्रयास किया और मरीज की मौत के बाद जांच न कराकर उस अवैध अस्पताल का पंजीकरण करने को सही तहराया। वही जब मुख्य चिकित्सा अधिकारी नरेंद्र बहादुर सिंह से इस प्रकरण के बारे मे जानकारी ली गई तो उन्होंने भी उस अवैध अस्पताल के पंजीकरण को विभागीय प्रक्रिया एवं क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्टश् अन्तर्गत जायज ठहराया।जबकि क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत किसी भी अस्पताल को मरीजों का इलाज शुरू करने से पहले पंजीकरण  कराना अनिवार्य होता है। किसी दुर्घटना या मरीज की मौत के बाद अस्पताल का पंजीकरण करवाकर पिछली गलतियों या अवैध संचालन को वैध नहीं किया जा सकता।क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट अंतर्गत अगर कोई अस्पताल बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहा था और वहां किसी मरीज की मौत हो जाती है, तो ब्डव् को सूचना देने के बाद भी प्रबंधन पर एक्ट की धारा के तहत पहली बार उल्लंघन पर ₹50,000 तक का जुर्माना किया जा सकता है साथ ही प्रशासन द्वारा उस अस्पताल को तुरंत बंद या सील किया जा सकता है। मरीज की मौत होने की स्थिति में केवल क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट ही नहीं, बल्कि भारतीय न्याय संहिता (ठछै) (पहले की प्च्ब्) के तहत लापरवाही से मौत या गैर-इरादतन हत्या का आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हो सकता है। सीएमओ को सूचना देने का मतलब यह कतई नहीं है कि अस्पताल का पुराना बिना रजिस्ट्रेशन वाला संचालन वैध हो गया। बल्कि, ऐसी सूचना मिलने पर सीएमओ की यह कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वे उस अवैध अस्पताल के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई (थ्प्त्, सीलिंग और जुर्माना) शुरू करें।

पीड़ित के शिकायत पत्र पर करवाई न करना और क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट की आड़ मे अवैध अस्पताल मे मरीज की मौत के बाद भी पंजीकरण करने को लेकर वकालत करना कहा तक जायज है,बहुत ही गंभीर सोचनीय प्रश्न है ?।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Design by - Blogger Templates |