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रुद्रपुर: विवादों से घिरे डीपीआरओ के कार्यकाल में करोड़ों के टेंडर पर सवाल, 6 बहुउद्देशीय भवनों की निविदाओं को लेकर उठी जांच की मांग


  • विवादों से घिरे डीपीआरओ के कार्यकाल में करोड़ों के टेंडर पर बवाल
  • पहले भी विवादों में रहा है डीपीआरओ का कार्यकाल
  • 6 बहुउद्देशीय भवनों के टेंडर पर उठे बड़े सवाल
  • उच्चस्तरीय जांच की मांग, पारदर्शिता पर खड़े हुए सवाल

रुद्रपुर। पंचायत राज विभाग में एक बार फिर जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) विद्या सिंह सोमनाल का कार्यकाल सवालों के घेरे में आ गया है। बीएलआरसी मद के तहत करीब पांच माह पूर्व 6 बहुउद्देशीय भवनों के लिए जारी की गई करोड़ों रुपये की निविदाओं को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। चर्चा है कि जिन कार्यों के टेंडर जारी किए गए, उन्हें जारी करने का अधिकार सीधे तौर पर डीपीआरओ को प्राप्त नहीं था। ऐसे में पूरे प्रकरण ने विभागीय गलियारों में हलचल मचा दी है।

मामला इसलिए भी अधिक संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि डीपीआरओ विद्या सिंह सोमनाल पूर्व में भी कई विवादों को लेकर चर्चा में रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों और विभागीय चर्चाओं के अनुसार, उनके कार्यकाल के दौरान देहरादून में अनियमितताओं के आरोप लगे थे, जिसके चलते उन्हें निलंबन की कार्रवाई का सामना भी करना पड़ा था। इसके अलावा त्रिस्तरीय पंचायतों को मिलने वाले लगभग 4.22 करोड़ रुपये के अनुदान समय पर जारी न होने का मामला भी विवादों में रहा, जिससे विकास कार्य प्रभावित होने और शासन स्तर पर सवाल उठने की बात सामने आई थी अब एक बार फिर उनके कार्यकाल में जारी किए गए 6 बहुउद्देशीय भवनों के टेंडरों ने नई बहस छेड़ दी है। जानकारों का कहना है कि सरकारी निर्माण कार्यों की निविदा प्रक्रिया निर्धारित वित्तीय और प्रशासनिक नियमों के तहत संचालित होती है तथा इसके लिए सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर किस अधिकार और किस अनुमति के आधार पर करोड़ों रुपये के इन कार्यों की निविदाएं जारी की गईं।

सबसे बड़े सवाल-

  1. क्या डीपीआरओ को इन निर्माण कार्यों की निविदा जारी करने का अधिकार था?
  2. यदि अधिकार नहीं था तो टेंडर किसके निर्देश पर निकाले गए?
  3. क्या सक्षम प्राधिकारी से पूर्व स्वीकृति ली गई थी?
  4. क्या वित्तीय और प्रशासनिक नियमों का पूर्ण पालन किया गया?
  5. टेंडर प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता या पक्षपात तो नहीं हुआ?
  6. क्या विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी तय की जाएगी?

सूत्रों का कहना है कि यदि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो फाइलों से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। यदि निविदा प्रक्रिया नियमों के विपरीत पाई जाती है तो केवल टेंडर ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े प्रशासनिक निर्णयों और भुगतान प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि पंचायत राज विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभाग में करोड़ों रुपये के कार्यों को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

पहले से विवादों में रहे अधिकारी के कार्यकाल में अब करोड़ों के टेंडरों पर उठे सवालों ने शासन की स्थानांतरण नीति, विभागीय निगरानी और वित्तीय अनुशासनकृतीनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि शासन और विभाग इस मामले में जांच कराते हैं या फिर यह प्रकरण भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

पंचायत राज विभाग में बीएलआरसी मद के तहत 6 बहुउद्देशीय भवनों के लिए करीब पांच माह पूर्व जारी की गई निविदाओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप हैं कि तत्कालीन जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) विद्या सिंह सोमनाल ने ऐसे टेंडर जारी किए, जिनके लिए उन्हें सीधे तौर पर अधिकार प्राप्त नहीं थे। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि सरकारी नियमों की अनदेखी और वित्तीय अनियमितता का भी बन सकता है।

विद्या सिंह सोमनाल का नाम इससे पहले भी कई विवादों में सामने आ चुका है। देहरादून में तैनाती के दौरान उन पर अनियमितताओं के आरोप लगे थे और उन्हें निलंबन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा त्रिस्तरीय पंचायतों को मिलने वाले लगभग 4.22 करोड़ रुपये के अनुदान के समय पर वितरण को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे। बार-बार एक ही जिले में तैनाती और पूर्व विवादों के कारण उनकी कार्यशैली पहले से ही चर्चा का विषय रही है।

मामले में कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या डीपीआरओ को इन कार्यों की निविदा जारी करने का अधिकार था? यदि नहीं, तो किसके निर्देश पर टेंडर जारी किए गए? क्या सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली गई थी? क्या वित्तीय और प्रशासनिक नियमों का पालन किया गया? और क्या निविदा प्रक्रिया में नियमों को दरकिनार कर आगे बढ़ाया गया? इन सवालों के जवाब अभी तक विभाग की ओर से स्पष्ट नहीं किए गए हैं।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि करोड़ों रुपये के सरकारी कार्यों में नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह मामला अब केवल छह भवनों के टेंडर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पंचायत राज विभाग की पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। जांच के बाद ही साफ हो सकेगा कि यह प्रशासनिक भूल थी या फिर नियमों को ताक पर रखकर पूरी प्रक्रिया संचालित की गई।।

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