पीलीभीत। जिले के सबसे सुरक्षित और संवेदनशील माने जाने वाले कलेक्ट्रेट परिसर में घटी एक दर्दनाक घटना ने सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विद्युत लाइन की मरम्मत के दौरान करंट लगने से संविदा विद्युत कर्मी विजय की मौत हो गई। लेकिन इस हादसे से भी ज्यादा दर्दनाक वह आरोप हैं, जिनके अनुसार करंट से झुलसने के बाद विजयपाल करीब 40 मिनट तक जमीन पर तड़पता रहा और मदद के लिए गुहार लगाता रहा, जबकि जिम्मेदार अधिकारी समय पर मौके पर नहीं पहुंचे।
विगत दिवस कलेक्ट्रेट परिसर में विद्युत लाइन की मरम्मत का कार्य चल रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक कार्य के दौरान अचानक लाइन में करंट दौड़ गया और संविदाकर्मी विजय उसकी चपेट में आ गया। करंट लगते ही वह पोल से नीचे गिर पड़ा और गंभीर रूप से घायल हो गया। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। साथी कर्मचारियों ने तत्काल सहायता के लिए आवाज लगाई, लेकिन आरोप है कि काफी देर तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचा।
चश्मदीदों का कहना है कि विजय दर्द से कराहता रहा और साथी कर्मचारी उसे बचाने के लिए इधर-उधर दौड़ते रहे। कर्मचारियों का आरोप है कि यदि समय रहते एंबुलेंस और प्राथमिक उपचार उपलब्ध हो जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। घटना के दौरान मौजूद लोगों ने बताया कि लगभग 40 मिनट तक घायल कर्मचारी जमीन पर पड़ा तड़पता रहा, लेकिन राहत और बचाव की व्यवस्था नदारद रही।
घटना के बाद विद्युत विभाग के जूनियर इंजीनियर के मौके पर पहुंचने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था की गई। गंभीर हालत में विजय को अस्पताल भेजा गया, लेकिन वहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मौत की खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया। पत्नी बेसुध हो गई और तीन वर्षीय मासूम बच्चे के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया।
हादसे के बाद मृतक के परिजनों और साथी कर्मचारियों में जबरदस्त आक्रोश फैल गया। परिजनों ने शव का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया और कई मांगों को लेकर धरने जैसी स्थिति बना दी। परिजनों का आरोप है कि लाइनमैन की लापरवाही के कारण यह हादसा हुआ। उनका दावा है कि कार्य शुरू करने से पहले आवश्यक शटडाउन नहीं लिया गया, जिसके चलते जनरेटर लाइन में करंट दौड़ गया और विजय उसकी चपेट में आ गया।
परिजनों ने दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, संबंधित लाइनमैन के निलंबन, मृतक के परिवार को उचित मुआवजा तथा परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि विजय परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था और उसकी मौत के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
घटना के बाद विद्युत विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और परिजनों को समझाने का प्रयास किया। देर शाम तक वार्ता का दौर चलता रहा, लेकिन परिजन अपनी मांगों पर अड़े रहे। उधर पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम की कार्रवाई शुरू कर दी है।
यह हादसा सिर्फ एक कर्मचारी की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो सुरक्षा के दावे तो करती है, लेकिन संकट की घड़ी में अपने ही कर्मचारियों को समय पर मदद नहीं दे पाती। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण परिसर में आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था आखिर क्यों नहीं थी? क्या एक घायल कर्मचारी की जिंदगी इसलिए चली गई क्योंकि व्यवस्था समय पर जाग नहीं सकी?
अब पूरे मामले में प्रशासनिक जांच की मांग तेज हो गई है। यदि शटडाउन न लेने और राहत पहुंचाने में देरी के आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि घोर लापरवाही का मामला माना जाएगा। एक परिवार अपना सहारा खो चुका है और अब पूरे जिले की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।
