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सहारनपुरः नगर निगम टेंडरों पर उठे सवाल रू ठेकेदारों की गुप्त बैठक के बाद सांठगांठ की चर्चाएं तेज


सहारनपुर। नगर निगम में आगामी करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के टेंडरों को लेकर ठेकेदारों के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई अब सुलह में बदलती दिखाई दे रही है। सूत्रों के अनुसार शहर के चर्चित ठेकेदार “मियां भाई” के आवास पर हाल ही में एक गोपनीय बैठक आयोजित हुई, जिसमें नगर निगम से जुड़े कई बड़े ठेकेदार शामिल हुए। बैठक में पुराने विवाद भुलाकर एकजुट होकर काम करने और टेंडर प्रक्रिया में आपसी तालमेल बनाए रखने पर सहमति बनने की चर्चा है।

बताया जा रहा है कि नगर निगम में जल्द ही दो सौ से अधिक विकास कार्यों के टेंडर जारी होने हैं। इसी को देखते हुए ठेकेदारों ने “एक रायदृएक साथ” की रणनीति तैयार की है। बैठक में कथित तौर पर पुल प्रथा, टेंडर मैनेजमेंट और एक-दूसरे को सहयोग देने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

सूत्रों का कहना है कि पिछले कई महीनों से मियां भाई और दिल्ली रोड क्षेत्र के एक बड़े ठेकेदार के बीच आरोप-प्रत्यारोप और खींचतान का माहौल बना हुआ था, लेकिन अब दोनों पक्षों के बीच समझौता होने की बात सामने आ रही है। इसके बाद निगम के आगामी टेंडरों को लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।

वहीं दूसरी ओर टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि पहले 5 मई 2026 को प्रस्तावित कुछ टेंडरों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर 14 मई 2026 किया गया और बाद में फिर 28 मई 2026 तक समय बढ़ा दिया गया। सूत्रों के मुताबिक यह समयवृद्धि एक प्रभावशाली ठेकेदार के दबाव में की गई, ताकि सभी टेंडर एक ही तारीख में कराए जा सकें।

चर्चा यह भी है कि संबंधित ठेकेदार ने विभागीय अधिकारियों पर दबाव बनाकर पूरे सिस्टम को अपने प्रभाव में ले लिया है। विरोध करने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट कराने, उनके कार्यों की जांच बैठवाने और भुगतान रुकवाने जैसी धमकियां दिए जाने के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि नियमों के जानकारों का कहना है कि बिना ठोस आधार किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करना या भुगतान रोकना आसान नहीं होता।

सूत्रों के अनुसार कथित तौर पर विभागीय स्तर पर “प्रतिशत सेटिंग” की भी चर्चा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ अधिकारियों को सात प्रतिशत हिस्सेदारी देने का भरोसा देकर टेंडरों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। यदि इन आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो इससे सरकारी राजस्व को भारी वित्तीय नुकसान पहुंच सकता है और विकास कार्यों की गुणवत्ता व पारदर्शिता पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर निगम प्रशासन और उच्च अधिकारी इन आरोपों को कितना गंभीरता से लेते हैं तथा टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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