लखनऊ।उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर किए जा रहे दावों की पोल एक बार फिर प्रदेश की राजधानी में ही खुल गई है। लखनऊ के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज से आए हालिया वीडियो और रिपोर्ट्स ने योगी सरकार के 'ऑल इज वेल' के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। आलम यह है कि घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी मरीजों को न तो बेड मिल रहा है और न ही डॉक्टर।
व्यवस्था नहीं, बदहाली का मंजर
अस्पताल के गलियारों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे विचलित करने वाली हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का 'अकाल' झेल रहे मरीजों का कहना है कि यहाँ सुध लेने वाला कोई नहीं है।
घंटों का इंतजार: गंभीर रूप से बीमार मरीज और उनके तीमारदार सुबह से शाम तक लाइनों में खड़े रहने को मजबूर हैं।
बेड का अभाव: स्ट्रेचर पर पड़े मरीज वार्ड में एक खाली बेड के लिए तरस रहे हैं।
स्टाफ की बेरुखी: मरीजों का आरोप है कि अस्पताल का स्टाफ न तो जानकारी दे रहा है और न ही संवेदनशीलता दिखा रहा है।
'छापेमारी' पर उठे सवाल: क्या यह महज नौटंकी है?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में जनता का गुस्सा सीधे स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक पर फूट रहा है। जनता का आरोप है कि मंत्री जी की औचक छापेमारी और कैमरों के सामने दी जाने वाली हिदायतें जमीनी हकीकत बदलने में नाकाम रही हैं।
"जनता के टैक्स का पैसा कहाँ जा रहा है? स्वास्थ्य मंत्री जी, कैमरे हटाकर कभी इन मरीजों के बीच बैठकर उनका दर्द देखिए। यह व्यवस्था नहीं, जनता के साथ किया गया
विश्वासघात है।" — एक परेशान तीमारदार का बयान
वोट देने वाले भी अब मुखर
इस बार की नाराजगी खास है क्योंकि भाजपा के कट्टर समर्थक होने का दावा करने वाले लोग भी अब इस कुप्रबंधन को देख चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि उन्होंने बेहतर इलाज और सम्मान के लिए वोट दिया था, न कि अस्पताल के बरामदों में दम तोड़ने के लिए।
मुख्य सवाल जो जनता पूछ रही है:
क्या राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल की यह स्थिति प्रदेश के अन्य जिलों के हालातों का आईना है?
स्वास्थ्य बजट का पैसा आखिर बुनियादी ढांचे को सुधारने में क्यों नहीं लग रहा?
क्या केवल 'छापेमारी' के वीडियो बनाना ही स्वास्थ्य मंत्रालय की मुख्य उपलब्धि है?
निष्कर्ष: लखनऊ की यह स्थिति चीख-चीखकर कह रही है कि स्वास्थ्य विभाग को पीआर स्टंट की नहीं, बल्कि एक ठोस सर्जरी की जरूरत है। अगर राजधानी के दिल में इलाज के लिए 'हाहाकार' मचा है, तो दूर-दराज के गांवों की कल्पना करना भी डरावना है।
