लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। कोर्ट ने मेयर सुषमा खर्कवाल के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों को तत्काल प्रभाव से सीज (जब्त) कर दिया है।न्यायालय के इस बड़े कदम के बाद नगर निगम और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
क्यों लिया गया इतना बड़ा एक्शन?
मिली जानकारी के मुताबिक, यह पूरी कार्रवाई हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश का पालन न करने (अवमानना) पर की गई है।अदालत की अवमाननारू मेयर पक्ष को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना था, लेकिन उनकी तरफ से इसमें लगातार लापरवाही बरती गई।सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहतरू मेयर पक्ष ने हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ही जगहों से मेयर को कोई राहत नहीं मिली। इसके बावजूद आदेश का अनुपालन न करने पर कोर्ट ने यह सख्त कदम उठाया।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की बेंच का आदेश
यह ऐतिहासिक और कड़ा आदेश जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने पारित किया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने साफ किया कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस हाई-प्रोफाइल मामले में याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट गौरव मेहरोत्रा ने पुरजोर बहस की और कोर्ट के सामने मेयर पक्ष की लापरवाही के सबूत पेश किए, जिसके बाद कोर्ट ने यह बड़ा फैसला सुनाया।
वकीलों का फूटा गुस्सारू तीन दिन पहले हुआ था लाठीचार्ज
इस पूरे मामले के पीछे वकीलों का भारी आक्रोश भी जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि महज तीन दिन पहले वकीलों पर हुए लाठीचार्ज और उनके चैंबर तोड़े जाने की घटना के बाद से ही राजधानी के अधिवक्ताओं में जबरदस्त नाराजगी है। वकीलों का कहना है कि प्रशासन और नगर निगम का रवैया लगातार तानाशाही पूर्ण रहा है। मेयर पर वकीलों की हाय लगी हैष् दृ कोर्ट परिसर में यह चर्चा आम है कि वकीलों के साथ हुए अन्याय और कोर्ट के आदेशों को हल्के में लेने का खामियाजा आज मेयर सुषमा खर्कवाल को भुगतना पड़ा है।
अब आगे क्या?
वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज होने का मतलब है कि अब मेयर लखनऊ नगर निगम से जुड़ा कोई भी आधिकारिक या बजट संबंधी फैसला नहीं ले पाएंगी। जब तक कोर्ट का अगला आदेश नहीं आता या इस मामले में मेयर पक्ष की तरफ से आदेश का पालन नहीं किया जाता, तब तक उनके हाथ पूरी तरह बंधे रहेंगे। राजधानी के इतिहास में किसी सिटिंग मेयर के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई विरली ही देखने को मिलती है। अब देखना यह होगा कि इस प्रशासनिक संकट से उबरने के लिए मेयर और सरकार क्या कदम उठाती है।

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