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प्रतापगगढः हमारी खबर का हुआ बड़ा असर! 30 दिन बाद पहुंचा गैस सिलेंडर, उपभोक्ता ने खोली होम डिलीवरी वसूली की पोल


प्रतापगगढ़। नगर पंचायत कोहंडौर क्षेत्र में रसोई गैस वितरण व्यवस्था को लेकर उपभोक्ताओं में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। एक उपभोक्ता ने आरोप लगाया कि ऑनलाइन बुकिंग और भुगतान के बावजूद उसे घरेलू गैस सिलेंडर की होम डिलीवरी के लिए पूरे 30 दिन तक इंतजार करना पड़ा। मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में गैस एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

कोहड़ौर नगर पंचायत के एक उपभोक्ता ने शशांक गैस सर्विस रामगंज से 3 अप्रैल को ऑनलाइन गैस सिलेंडर बुक कराया था। खाते से 967 रुपये भी कट गए, जिसमें होम डिलीवरी शुल्क शामिल बताया गया। इसके बावजूद एजेंसी द्वारा सिलेंडर घर पहुंचाने के बजाय उपभोक्ता को गोदाम से सिलेंडर लेने के लिए कहा गया। उपभोक्ता का आरोप है कि एजेंसी के कर्मचारी केवाईसी के नाम पर भी उपभोक्ताओं को कार्यालय बुलाकर परेशान करते हैं, जबकि डिलीवरी के समय घर पर ही केवाईसी की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

पीड़ित उपभोक्ता ने गोदाम से सिलेंडर लेने से इंकार करते हुए गैस कंपनी के टोल फ्री नंबर पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत को संज्ञान लेते हुए विधान केसरी ने उक्त मामले की प्रमुखता से खबर चलाई उसके बाद एजेंसी हरकत में आई और करीब एक माह बाद शशांक गैस सर्विस रामगंज द्वारा सिलेंडर की होम डिलीवरी की गई। बता दें कि उपभोक्ता को 967 रुपये का टैक्स इनवॉइस भी उपलब्ध कराया गया।

गौरतलब हो कि उपभोक्ता ने साफ कहा कि जब ऑनलाइन भुगतान में होम डिलीवरी शुल्क शामिल है तो अतिरिक्त पैसे मांगना गलत है। उसने लोगों से अपील की कि टैक्स इनवॉइस में दर्ज राशि से अधिक भुगतान न करें।

क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि कई गैस एजेंसियां होम डिलीवरी के नाम पर उपभोक्ताओं से अतिरिक्त वसूली कर रही हैं। सूत्रों की मानें तो गांवों में सिलेंडर पहुंचाने के नाम पर 1000 व 1020 रुपये तक वसूले जा रहे हैं, जबकि गोदाम से सिलेंडर लेने पर भी उपभोक्ताओं से खुले पैसे न होने का बहाना बनाकर अधिक रकम ली जाती है।

ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत करने पर एजेंसी की ओर से दबाव बनाया जाता है, जिससे अधिकांश लोग चुप्पी साध लेते हैं। लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि कई गोदामों पर रेट बोर्ड, शिकायत नंबर और सक्षम अधिकारियों के संपर्क नंबर तक प्रदर्शित नहीं किए जाते, जो उपभोक्ता अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग और सक्षम अधिकारी उक्त जमीनी हकीकत की जांच करेंगे या फिर मामला केवल शिकायतों और आश्वासनों तक ही सीमित रह जाएगा।

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