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दिल्ली में आग बनी काल, डेढ़ महीने में 18 मौतें


दिल्ली में पिछले डेढ़ महीने के भीतर आग की दो बड़ी घटनाओं ने 18 लोगों की जान ले ली. इन हादसों में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसी को नहीं बख्शा गया. लगातार हो रही ऐसी घटनाओं ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था की हकीकत सामने ला दी है. अब सवाल उठ रहा है कि क्या इमारतों में सुरक्षा नियमों का पालन हो रहा है और क्या दमकल विभाग पूरी तरह तैयार है?

रविवार तड़के शाहदरा के विवेक विहार इलाके में एक 4 मंजिला इमारत में अचानक आग लग गई. सुबह करीब 3:48 बजे जैसे ही सूचना मिली, दमकल, पुलिस और आपदा प्रबंधन की टीमें मौके पर पहुंच गईं. लेकिन तब तक आग कई फ्लैट्स में फैल चुकी थी और हालात बेहद गंभीर हो चुके थे. लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन कई लोग आग और धुएं में फंस गए.

रेस्क्यू के दौरान अलग-अलग मंजिलों से 9 शव बरामद किए गए. जांच में सामने आया कि इमारत की सीढ़ियों का रास्ता बंद था, जिससे लोग बाहर नहीं निकल पाए. यही वजह बनी कि कई लोग धुएं और आग के बीच फंसकर दम तोड़ बैठे. अगर निकासी का रास्ता खुला होता तो शायद कई जानें बच सकती थीं.

इस हादसे में सबसे ज्यादा तबाही दूसरी मंजिल पर देखने को मिली, जहां एक ही परिवार के 5 लोगों की मौत हो गई. तीसरी मंजिल पर भी एक परिवार पूरी तरह खत्म हो गया. पहली मंजिल पर एक महिला की जान गई, जबकि उनके पति गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं. इस हादसे ने कई घरों को उजाड़ दिया.

दमकल की 12 गाड़ियों और कई एजेंसियों की मदद से करीब 10 से 15 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया. हालांकि आग पर काबू पाने में कई घंटे लग गए. इस दौरान आग ने काफी नुकसान कर दिया. फिलहाल आग लगने के कारणों का पता नहीं चल पाया है, लेकिन शुरुआती जांच में लापरवाही की आशंका जताई जा रही है

इससे पहले मार्च में पालम इलाके में भी ऐसा ही दर्दनाक हादसा हुआ था. वहां एक बहुमंजिला इमारत में लगी आग ने एक ही परिवार के 9 लोगों की जान ले ली थी. आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को संभलने का मौका ही नहीं मिला.

जिस इमारत में आग लगी थी, उसके बेसमेंट में कपड़े और कॉस्मेटिक का थोक सामान रखा था. सिंथेटिक कपड़े, प्लास्टिक और केमिकल की वजह से आग और तेजी से फैल गई. सुबह करीब 6:15 बजे शॉर्ट सर्किट से शुरू हुई आग कुछ ही मिनटों में बेकाबू हो गई.

ऊपरी मंजिलों पर रहने वाले 19 सदस्यों के संयुक्त परिवार में से 12 लोग उस वक्त घर में थे. इनमें से 9 लोगों की मौत हो गई. मरने वालों में बुजुर्ग महिला से लेकर 3 छोटी बच्चियां भी शामिल थीं. बाकी लोग या तो घायल हो गए या किसी तरह बच निकले.

हादसा इतना भयावह था कि एक पिता को अपनी बच्ची को बचाने के लिए दूसरी मंजिल से नीचे फेंकना पड़ा और खुद भी कूदना पड़ा. यह दृश्य इलाके के लोगों के लिए बेहद डरावना था और आज भी लोग उसे याद कर सहम जाते हैं.

इस हादसे में परिवार के 7 सदस्य घर पर नहीं थे, जिससे उनकी जान बच गई. लेकिन जब वे लौटे तो उनका आधा परिवार खत्म हो चुका था. यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक परिवार की पूरी दुनिया उजड़ने की कहानी बन गया.

इन दोनों घटनाओं के बीच महज डेढ़ महीने का अंतर है, लेकिन दोनों में एक जैसी लापरवाही सामने आई. कहीं निकासी का रास्ता बंद था, तो कहीं ज्वलनशील सामान ने आग को और भड़काया.

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या इमारतों में फायर सेफ्टी के नियमों का पालन हो रहा है? क्या नियमित जांच हो रही है? क्या दमकल विभाग के पास पर्याप्त संसाधन हैं? और सबसे अहम क्या इन हादसों को रोका जा सकता था?

राजधानी में बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं साफ संकेत दे रही हैं कि अब सिर्फ जांच नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई और पुख्ता इंतजाम की जरूरत है, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को ऐसा दर्द न झेलना पड़े.

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