लखनऊ! पार्टिकल जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश सिद्धार्थ बाल्मीकि ने दलित और पिछड़ी राजनीति के स्थापित चेहरों पर तीखा प्रहार करते हुए एक विवादित लेकिन महत्वपूर्ण बयान जारी किया है। उन्होंने सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दलों के प्रमुख नेताओं को 'असली मनुवादी' करार देते हुए उन पर अति-दलितों और अति-पिछड़ों का हक मारने का आरोप लगाया है। और कहा कि कम से कम कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सच्चाई को स्वीकार कर अतिदलित जातियों को भी साथ लेकर चलने का दावा तो किया है
प्रमुख आरोप: "बाबासाहेब के नाम पर केवल जुगाड़बाजी"
राजेश सिद्धार्थ ने कहा कि पिछले 20 वर्षों के राजनीतिक अनुभव में उन्होंने सभी प्रमुख दलों को करीब से देखा है। उन्होंने कहा:
"जो नेता ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर को मनुवादी बताकर राजनीति करते हैं, वे खुद सबसे बड़े मनुवादी हैं। बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर और कांशीराम जी का नाम लेकर ये नेता केवल अपनी सत्ता की जुगाड़बाजी में माहिर हैं।"
सत्ता में भागीदारी का तुलनात्मक विश्लेषण
सिद्धार्थ ने अपने बयान में ऐतिहासिक तुलना करते हुए कहा कि कथित 'सवर्ण' और अन्य ओबीसी नेताओं का कार्यकाल अति-दलितों के लिए बेहतर रहा।
सराहना: उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि इन नेताओं ने अति-पिछड़ी और अति-दलित जातियों के लिए ठोस काम किए।
आलोचना: उन्होंने सीधे तौर पर मायावती (बहनजी) पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए बाल्मीकि, कोरी, खटीक और धानुक जैसी अति-दलित जातियों को सत्ता और पावर से दूर रखा गया।
"9% जाटव या 10% यादव-कुर्मी ही बहुजन नहीं"
राजेश सिद्धार्थ ने 'बहुजन' शब्द की नई परिभाषा देते हुए कहा कि केवल एक विशेष जाति से होना बहुजन मिशन नहीं है। उन्होंने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि जाटव समुदाय अति-दलितों के कोटे का पूरा हिस्सा खा रहा है।
यादव और कुर्मी समाज अति-पिछड़ी जातियों के हक पर कब्जा जमाए हुए हैं।
उनका मानना है कि असली बहुजन वही 'अति-दलित' और 'अति-पिछड़े' हैं जिन्हें अभी तक मुख्यधारा में जगह नहीं मिली है।
भावी रणनीति: "मांगने वाले नहीं, बांटने वाले बनो"
पार्टिकल जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष ने अति-दलितों और अति-पिछड़ों से अपील की है कि वे अपनी 50% वोट की ताकत को पहचानें। उन्होंने कहा कि इन वर्गों को अब दूसरों से हक मांगने के बजाय खुद सत्ता का मालिक बनना चाहिए ताकि वे सभी वर्गों का समान विकास और सम्मान कर सकें।
अंत में, उन्होंने जनता को "भाजपाई एजेंटों" और उन नेताओं से सावधान रहने को कहा जो खुद को बहुजन मिशन का सिपाही बताते हैं, लेकिन असल में अन्य बड़े दलों के 'प्रोडक्शन' (मोहरे) के रूप में काम कर रहे हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट
