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बंगाल चुनाव से भाजपा के नारी वंदन की पोल खुली! 98 की जगह बनाई 36 प्रत्याशी

 


  • पश्चिम बंगाल/नई दिल्ली! नारी शक्ति वंदन' का दावा, पर टिकट में कंजूसी: 
  • क्या भाजपा के लिए महिला आरक्षण सिर्फ 'हाथी के दांत' है?

कोलकाता/लखनऊ: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के अंतिम चरण के मतदान के बाद अब गलियारों में चुनावी गणित से ज्यादा राजनीतिक शुचिता और वादों पर बहस छिड़ गई है। सबसे बड़ा सवाल केंद्र की सत्ताधारी भाजपा पर उठ रहा है, जिसने संसद से 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पारित कराकर ऐतिहासिक श्रेय तो लिया, लेकिन जब बंगाल की धरती पर उसे जमीन पर उतारने की बारी आई, तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

33 प्रतिशत का दावा, पर 15 प्रतिशत भी नहीं?

​राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि भाजपा महिला आरक्षण की सच्ची हितैषी है, तो बंगाल की 294 सीटों में से कम से कम 97-98 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारना चाहिए था। लेकिन हकीकत यह है कि पार्टी ने बमुश्किल 36-40 महिलाओं को टिकट दिया। यह आंकड़ा 12 से 13 प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गया है।

​जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि जिस 'नारी शक्ति' के दम पर चुनाव जीतने का दावा किया जा रहा है, उसे प्रतिनिधित्व देने में इतनी हिचकिचाहट क्यों?

​'हाथी के दांत: खाने के और, दिखाने के और'

​विपक्ष और जागरूक नागरिक इसे भाजपा की दोहरी राजनीति करार दे रहे हैं। सवाल पूछा जा रहा है कि:

क्या आरक्षण का कानून सिर्फ 2029 के भविष्य की योजना है?

​क्या वर्तमान में स्वेच्छा से महिलाओं को 33 प्रतिशत टिकट देने से किसी ने रोका था?

​क्या यह मान लिया जाए कि 'नारी शक्ति वंदन' केवल एक चुनावी नारा है, जिसे लागू करने की नियत अभी कोसों दूर है?

पेंच जनगणना और परिसीमन का, या मंशा का?

​सरकार का तर्क है कि तकनीकी कारणों (जनगणना और परिसीमन) की वजह से कानून अभी प्रभावी नहीं हो सकता। लेकिन तर्क यह दिया जा रहा है कि पार्टी स्तर पर टिकट वितरण के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि 'इच्छाशक्ति' की जरूरत होती है। बंगाल चुनाव में महिलाओं की भारी भागीदारी के बावजूद उन्हें नेतृत्व की कतार में पीछे रखना, कहीं न कहीं पार्टी के दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है।

निष्कर्ष-

​बंगाल की रणभूमि में एक तरफ ममता बनर्जी की 52 महिला प्रत्याशी हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा का 36 का आंकड़ा। 4 मई को आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि महिलाएं केवल 'वोट बैंक' बनकर रह जाएंगी या भविष्य में उन्हें वह 33 प्रतिशत का संवैधानिक अधिकार वास्तव में मिलेगा जिसका ढिंढोरा पीटा जा रहा है। फिलहाल तो भाजपा का यह रवैया 'हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और' वाली कहावत को ही चरितार्थ कर रहा है।

​[विधान केसरी डेस्क]

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