पीलीभीत। जनपद के प्रतिष्ठित दिल्ली पब्लिक स्कूल में शिक्षा के नाम पर चल रहे कथित लूट के खेल ने अभिभावकों और प्रशासन दोनों को झकझोर कर रख दिया है। लंबे समय से मिल रही शिकायतों के बाद जब जिला विद्यालय निरीक्षक राजीव कुमार ने विद्यालय में औचक छापेमारी की, तो जो सच सामने आया वह बेहद चैंकाने वाला था।जांच के दौरान पाया गया कि विद्यालय प्रबंधन ने नियमों को ताक पर रखते हुए स्कूल परिसर के भीतर ही एक कक्षा कक्ष को पुस्तकों की दुकान में तब्दील कर दिया था। यहां छात्रों और अभिभावकों को खुलेआम महंगे दामों पर किताबें बेची जा रही थीं। स्थिति यह थी कि अभिभावकों को बाजार से सस्ती किताबें खरीदने का कोई विकल्प ही नहीं दिया जा रहा था, बल्कि उन्हें स्कूल से ही किताबें खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा था।
अभिभावकों का आरोप है कि यह पूरी व्यवस्था सुनियोजित तरीके से चलाई जा रही थी। कक्षा 7 की किताबों का सेट करीब 9,500 रुपये में बेचा जा रहा था, जबकि कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों से 6,000 से 10,000 रुपये तक वसूले जा रहे थे। यह रकम बाजार कीमतों से कहीं अधिक बताई जा रही है, जिससे अभिभावकों में भारी आक्रोश है। यह पूरा मामला ब्मदजतंस ठवंतक व िैमबवदकंतल म्कनबंजपवद (ब्ठैम्) के नियमों की खुली अवहेलना है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी विद्यालय परिसर के भीतर इस प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां नहीं चला सकता और न ही अभिभावकों पर किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने का दबाव बना सकता है।छापेमारी के दौरान डीआईओएस ने सख्त रुख अपनाते हुए मौके पर ही पुस्तक बिक्री पर रोक लगा दी और विद्यालय प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यदि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताएं दोबारा पाई गईं, तो एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा और विद्यालय की मान्यता तक रद्द की जा सकती है।इस कार्रवाई के बाद जिले के अन्य निजी विद्यालयों में भी हड़कंप मच गया है। प्रशासन ने स्पष्ट संदेश दिया है कि शिक्षा के नाम पर किसी भी प्रकार की अवैध वसूली को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।डीआईओएस ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि वे जागरूक रहें और किसी भी प्रकार के दबाव में आकर खरीदारी न करें। यदि कोई विद्यालय नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसकी सूचना तुरंत प्रशासन को दें, ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके।यह घटना न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कुछ निजी स्कूल किस तरह शिक्षा को व्यापार बनाकर अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले में आगे क्या ठोस कदम उठाता है और क्या दोषियों पर वास्तव में कड़ी कार्रवाई होती है या नहीं।

