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बदलता समाज और नैतिकता के नए मापदंड! क्या हम वास्तव में ‘विकास’ कर रहे हैं या केवल ‘बाजारवाद’ का हिस्सा बनकर रह गए हैं?



आज हम स्मार्ट सिटी और तकनीकी क्रांति के जिस शोर-शराबे वाले दौर में जी रहे हैं, वहां एक मौन वैचारिक पतन भी समानांतर चल रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितनी भौतिक उन्नति की, प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में सभ्य हो रहे हैं या केवल बाजारवाद के उत्पाद बनकर रह गए हैं? हालिया सामाजिक अनुभवों से उपजी यह कड़वी सच्चाई हमें आईना दिखाती है कि हमारे मानवीय मूल्य अब केवल शब्दकोशों तक सीमित रह गए हैं। 

एक दौर था जब समाज में व्यक्ति की पहचान उसके चरित्र और उसकी साख से होती थी। तब आदर्श था कि जेब भले ही खाली हो, पर मस्तक ऊँचा रहना चाहिए, किंतु आज का यथार्थवादी दृष्टिकोण इसे महज एक पुराना जुमला मानता है। समाज अब ज्ञान या नैतिकता को नहीं, बल्कि आपके जीवन स्तर और धन-संपदा को तौलता है। कटु सत्य तो यह है कि सम्मान शब्द का प्रयोग अब अक्सर उन लोगों के लिए एक सांत्वना पुरस्कार की तरह किया जाता है, जो आर्थिक दौड़ में पीछे छूट गए हैं। जीवन के वास्तविक संकटों में अब व्यक्ति का कोरा व्यवहार काम नहीं आता, बल्कि उसकी आर्थिक क्षमता ही सुरक्षा कवच बनती है। समाज अब आदर उसे ही देता है जिसके पास श्सामर्थ्यश् है।

पुरानी और नई पीढ़ी के बीच का यह द्वंद्व अब केवल उम्र का नहीं, बल्कि मूल्यों के चुनाव का है। हमारे पूर्वजों के लिए यह प्रश्न सर्वोपरि था कि धन कैसे अर्जित किया गया है? तब ईमानदारी और पुरुषार्थ धनार्जन की अनिवार्य शर्तें थीं और

अनैतिक मार्ग से कमाया गया धन सामाजिक तिरस्कार का कारण बनता था। इसके विपरीत, आज की त्वरित पीढ़ी के लिए साधन गौण हैं और परिणाम ही अंतिम सत्य बन गया है। समाज अब वाहन के आने का मार्ग नहीं पूछता, केवल वाहन का स्तर देखता है। सफलता की एकमात्र कसौटी उपलब्धि रह गई है, चाहे वह किसी भी मार्ग से प्राप्त की गई हो। इसी चकाचैंध में अक्सर लोग इस मुगालते में जीते हैं कि उनका सामाजिक दायरा बहुत विस्तृत है, लेकिन चाय की चैपालों और उत्सवों में दिखने वाली यह भीड़ अक्सर पहली ही आर्थिक ठोकर लगते ही ओझल हो जाती है। लोग आपके साथ तब तक खड़े हैं जब तक आप उनके प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं। जिस दिन आप सहायता की स्थिति में आते हैं, तथाकथित शुभचिंतकों की संख्या तेजी से घटने लगती है। यह सामाजिक व्यवहार का वह बुलबुला है जो यथार्थ की सुई चुभते ही फूट जाता है।

यह एक त्रासद विडंबना है कि हमने कीमत को ही मूल्य मान लिया है। मानवीय संवेदनाओं का स्थान अब भौतिक सुख-सुविधाओं और आर्थिक स्थिरता ने ले लिया है। नैतिकता के पुराने मंदिर खंडहर हो रहे हैं और उपयोगितावाद समाज का नया धर्म बनता जा रहा है। पैसा अब रिश्तों की वैधता का आधार बन गया है। हमें समय रहते यह सोचना होगा कि यदि भविष्य में इज्जत केवल पैसों से खरीदी जाएगी, तो हमारे पास मकान तो भव्य होंगे पर घर खाली होंगे, हमारे पास इंसान तो बहुत होंगे, पर इंसानियत शायद ही बचे।

लेखक -विक्रम पाण्डेय (पत्रकार)

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