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पीलीभीतः जुम्मा अलविदा का संदेशरू इफ्तार से मजबूत होती गंगा-जमुनी तहजीब


पीलीभीत। रमजान के पाक महीने का अंतिम शुक्रवार जुम्मा अलविदा केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक भी है। पीलीभीत शहर के निशात मैरिज हॉल में आयोजित रोजा इफ्तार कार्यक्रम ने इस परंपरा को एक बार फिर जीवंत कर दिया। सैकड़ों लोगों ने एक साथ बैठकर रोजा खोला और यह संदेश दिया कि भारत की असली ताकत उसकी साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब में ही निहित है।

इस आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे समाज की भागीदारी देखने को मिली। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर खजूर और गुजिया के साथ रोजा इफ्तार करते नजर आए। यह दृश्य केवल एक धार्मिक रस्म नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर सामने आया। ऐसे आयोजन यह बताते हैं कि जब समाज के लोग आपसी विश्वास और सम्मान के साथ मिलते हैं, तो धार्मिक और सामाजिक विविधता भी एक ताकत बन जाती है।

कार्यक्रम में पूर्व मंत्री अताउर्रहमान और वरिष्ठ अधिवक्ता पंडित सुधीर तिवारी सहित कई सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को और भी सार्थक बना दिया। उनके वक्तव्यों में भी यही संदेश प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि रमजान का महीना इंसानियत, सेवा, संयम और भाईचारे की सीख देता है। वास्तव में यही वे मूल्य हैं जो किसी भी समाज को मजबूत बनाते हैं।

आज के दौर में जब कई बार समाज में छोटी-छोटी बातों को लेकर मतभेद और तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है, तब ऐसे आयोजन समाज के लिए सकारात्मक संदेश लेकर आते हैं। ये कार्यक्रम याद दिलाते हैं कि हमारी साझा संस्कृति और आपसी सद्भाव ही वह आधार है, जिस पर सामाजिक शांति और विकास की इमारत खड़ी होती है।

पीलीभीत की पहचान भी हमेशा से प्रेम, शांति और भाईचारे के शहर के रूप में रही है। यहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग वर्षों से एक-दूसरे के त्योहारों और खुशियों में शामिल होते रहे हैं। यही परंपरा इस क्षेत्र की सामाजिक मजबूती की सबसे बड़ी वजह है।

समाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि ऐसे आयोजनों की संख्या बढ़े और उनमें हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित हो। जब लोग एक साथ बैठते हैं, संवाद करते हैं और एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हैं, तभी सामाजिक दूरी कम होती है और विश्वास मजबूत होता है।

इसी विश्वास और सौहार्द की भावना को आगे बढ़ाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जुम्मा अलविदा के अवसर पर आयोजित यह इफ्तार कार्यक्रम हमें यही याद दिलाता है कि धर्म चाहे अलग हों, लेकिन इंसानियत और भाईचारा ही वह साझा धागा है, जो पूरे समाज को एक सूत्र में बांधता है।

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