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पीलीभीत: गौशाला में मौत का तांडवरू भूख से तड़प-तड़प कर मरते गौवंश, सिस्टम की संवेदनहीनता बेनकाब”! मूसेपुर जयसिंह गौशाला की बदहाली पर फूटा जनाक्रोश, जिम्मेदारों पर कार्रवाई की उठी मांग


बरखेड़ा। एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार गौवंश संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करती है, गौमाता की सेवा को धर्म और कर्तव्य बताकर योजनाओं की लंबी फेहरिस्त गिनाई जाती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इतनी भयावह है कि इंसानियत भी शर्मसार हो जाए। विकास खंड की ग्राम पंचायत मूसेपुर जयसिंह स्थित गौशाला से सामने आई तस्वीरें न केवल प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलती हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।बताया जा रहा है कि महज दो दिनों के भीतर हरा चारा न मिलने के कारण 8 गोवंशीय पशुओं की मौत हो गई। यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी है जिसमें बेजुबान पशु भूख से तड़प-तड़प कर दम तोड़ते रहे और जिम्मेदार लोग आंख मूंदे बैठे रहे। सवाल यह है कि आखिर इन निरीह पशुओं का कसूर क्या था? स्थानीय लोगों और ग्राम प्रधान के अनुसार, कई दिनों से गौशाला में न तो भूसा उपलब्ध था और न ही हरा चारा। पशु भूख से बेहाल होकर इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन उन्हें न तो समय पर भोजन मिला और न ही उचित देखभाल। धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती गई और आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया। यह मौतें प्राकृतिक नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुई “हत्या” कही जाएं तो गलत नहीं होगा।और तो और, आरोप यह भी है कि जब से गौशालाओं का संचालन एनजीओ के हाथों में गया है, तब से व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। जिम्मेदारी तय होने के बजाय एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलता रहा, और इस बीच मासूम पशु अपनी जान गंवाते रहे।

घटना की सूचना मिलते ही बीसलपुर के एसडीएम नागेंद्र पाण्डेय, बीडीओ, पशु चिकित्सक और सीवीओ मौके पर पहुंचे। निरीक्षण के दौरान एक मृत और तीन गंभीर रूप से बीमार गायें मिलीं, जिससे साफ जाहिर होता है कि हालात कितने भयावह हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अधिकारियों का यह दौरा केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा या वाकई दोषियों पर कठोर कार्रवाई होगी?पंचायत सचिव रूपेश पर लापरवाही के आरोप लगे हैं, वहीं डीपीआरओ और पशु चिकित्सा विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। अगर समय रहते उचित इलाज और भोजन की व्यवस्था की जाती, तो शायद इन बेजुबान पशुओं की जान बचाई जा सकती थी।ग्राम प्रधान ने भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गौशाला में जो चारा दिया जा रहा था, वह बेहद घटिया और पोषक तत्वों से रहित था। यानी जो भोजन दिया भी जा रहा था, वह भी पशुओं के लिए किसी काम का नहीं था। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर गौशालाओं के नाम पर आने वाला बजट जा कहां रहा है?इस घटना ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। स्थानीय लोग सड़कों पर उतरकर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते इस लापरवाही पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आगे और भी बड़े हादसे हो सकते हैं।यह घटना केवल एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के चरित्र का आईना है। जब तक जिम्मेदारों को सख्त सजा नहीं मिलेगी और व्यवस्थाओं में पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक गौशालाएं ऐसे ही मौत के अड्डे बनी रहेंगी।अब वक्त आ गया है कि सरकार और प्रशासन केवल दावे न करें, बल्कि जमीनी स्तर पर कड़ी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करें। क्योंकि गौमाता की सेवा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस व्यवस्था और संवेदनशीलता से ही संभव है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि बेजुबानों के प्रति किया गया अपराध माना जाएगा।

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