आगरा । अक्सर समाज में यह सवाल उठाया जाता है कि सरकारी स्कूलों के बच्चे कैसे होते हैं। इस धारणा को बदलने का प्रयास करते हुए प्राथमिक विद्यालय की अध्यापिका नीलम मौर्या ने अपने अनुभव साझा किए और कहा कि सरकारी स्कूल के बच्चे कमजोर नहीं, बल्कि बेहद अनमोल होते हैं।
उन्होंने बताया कि इन बच्चों की जिंदगी संघर्षों से भरी होती है। छोटी उम्र में ही वे जिम्मेदारियाँ उठाना सीख जाते हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जो खुद अभी दुलार के हकदार हैं, लेकिन घर में छोटे भाई-बहनों का सहारा बन जाते हैं। उनके माता-पिता रोजी-रोटी की जद्दोजहद में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में बच्चों को समय भले कम मिल पाता हो, लेकिन उनके दिल में स्नेह और अपनापन भरपूर होता है।
अध्यापिका ने कहा कि जब ये बच्चे स्कूल आते हैं, तो उन्हें सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि एक सुनने वाला, समझने वाला और उन पर विश्वास करने वाला व्यक्ति भी मिलता है। कई बार बच्चे “मैम” की जगह “मम्मी” कह देते हैं या बिना किसी कारण आकर गले लग जाते हैं। यह उनकी कमी नहीं, बल्कि उनके स्नेह की गहराई को दर्शाता है।
उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा कि सरकारी स्कूल के बच्चों को कभी कम नहीं आँकना चाहिए। इन बच्चों में संघर्ष करने की शक्ति, संवेदनशीलता और आगे बढ़ने की अद्भुत क्षमता होती है। एक शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं होता, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाना, उनकी आँखों में सपने बोना और उन्हें जीवन की हर परिस्थिति में सिर उठाकर चलने योग्य बनाना भी होता है।
