आगरा। आधुनिक दौर में देश जहां विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है, वहीं समाज में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। क्षेत्रीय मद्यनिषेध एवं समाजोत्थान अधिकारी आलोक कुमार ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय समाज में शराब और अन्य मादक पदार्थों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।
उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत में मदिरा सेवन को घृणित कार्य माना जाता था, लेकिन आज के समय में इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाने लगा है। इसका सबसे अधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ रहा है, जो धीरे-धीरे नशे की लत का शिकार हो रहे हैं। इससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि दुनिया भर में हर वर्ष लगभग 25 लाख लोगों की मौत शराब के सेवन से होने वाली बीमारियों और दुर्घटनाओं के कारण होती है। इनमें हार्ट अटैक, लीवर की बीमारी, सड़क दुर्घटनाएं, आत्महत्या और कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं शामिल हैं। यह कुल मौतों का लगभग 3.8 प्रतिशत है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कई सामाजिक आयोजनों और उत्सवों में भी शराब का सेवन सामान्य माना जाने लगा है। पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं में भी मादक पदार्थों के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसकी संख्या लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इंग्लैंड में हुए एक शोध के अनुसार शराब का अत्यधिक सेवन अन्य मादक पदार्थों की तुलना में तीन गुना अधिक हानिकारक माना गया है।
आलोक कुमार ने कहा कि किसी भी समाज में नशे का बढ़ता वातावरण उसकी शक्ति, साहस, नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। पिछले दशक में देश में मदिरा के उत्पादन में भी कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है, जो चिंता का विषय है।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि नशामुक्त समाज की स्थापना के लिए हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। चिकित्सकों को भी आगे आकर जागरूकता अभियान चलाने, शिविर लगाने और नशा निवारण केंद्र स्थापित करने में सहयोग करना चाहिए, ताकि लोगों को इसके दुष्परिणामों की जानकारी मिल सके।
उन्होंने कहा कि यदि समाज मिलकर इस दिशा में प्रयास करेगा तो देश को एक स्वस्थ और नशामुक्त राष्ट्र बनाने का लक्ष्य अवश्य प्राप्त किया जा सकता है।
