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प्रतापगढः आज भी हंडौर में जीवंत है देशी फगुआ गाने की परंपरा, भारद्वाजपुरम् में ढोल-करताल पर गाया जाता है गीत


लालगंज/प्रतापगढ़। फाल्गुन माह की शुरुआत होते ही लक्ष्मणपुर ब्लॉक के हंडौर गांव स्थित भारद्वाजपुरम् दुबान में होली की पारंपरिक रंगत देखने को मिलती है।यहां आज भी देशी फगुआ गाने की परंपरा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ जीवित है। जैसे ही फाल्गुन का आगमन होता है, गांव के कलाकार अपने ढोल और करताल को दुरुस्त कराने में जुट जाते हैं और होली से करीब दस दिन पूर्व से ही गांव की गलियों में ढोल के डेढ़ताल और चैताल की थाप पर फगुआ गीत गूंजने लगते हैं। गांव के वरिष्ठ फगुआ गायक राजकुमार दुबे उर्फ लालजी बताते हैं कि यह परंपरा उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है। उनके अनुसार, गांव में उनके पूर्वज भी इसी तरह फगुआ गाते थे और उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज की पीढ़ी भी पूरे समर्पण के साथ इस सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए है। लक्ष्मीकांत दुबे ‘फौजी’ का कहना है कि यह केवल गीत-संगीत नहीं, बल्कि गांव की पहचान और सांस्कृतिक आत्मा है। पूर्वजों से मिली इस धरोहर को संजोकर रखना हम सभी का दायित्व है, जिसे गांव के कलाकार बखूबी निभा रहे हैं। वहीं राजकुमार एडवोकेट और राजेश दुबे ने कहा कि जब तक मां सरस्वती का आशीर्वाद गांव के कलाकारों पर बना रहेगा, तब तक होली के अवसर पर देशी फगुआ का गायन निरंतर होता रहेगा। हंडौर भारद्वाजपुरम् की यह परंपरा न केवल ग्रामीण संस्कृति की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि आधुनिकता के इस दौर में भी गांवों में लोकसंस्कृति की जड़ें आज भी मजबूत हैं। यहां होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि सुर, ताल और परंपरा का उत्सव बनकर हर वर्ष नई ऊर्जा के साथ मनाई जाती है। रविवार को लक्ष्मीकांत के संयोजन में आयोजित फगुआ गायन में मुख्य गायक के साथ ही ढोलक वादक हरिशंकर दुबे, लक्षीशंकर दुबे, राधेश्याम, रामगोपाल दुबे, भोलानाथ, अशोक दुबे, कृष्णकुमार, सुरेश, जगन्नाथ दुबे, संतोष दुबे, सूरज, राज, विकास, अंकित ,मुकेश दुबे आदि रहे।

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