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न्यायपालिका के बारे में विवादित बातों वाली NCERT की किताब पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक! जारी किया कारण बताओ नोटिस


NCERT की विवादित किताब पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. कक्षा 8 की इस किताब में न्यायपालिका के बारे में जो बातें लिखी गई हैं, उसे कोर्ट ने प्रथमदृष्टया अपराधिक अवमानना माना है. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन के सचिव और NCERT के निदेशक को इस बारे में कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

NCERT की सामाजिक विज्ञान की किताब Exploring Society: India and Beyond के अध्याय - The Role of Judiciary in our Society में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और मुकदमों के लंबित रहने को लेकर चर्चा की गई थी. इस अध्याय को लिखने के तरीके, इसकी सामग्री और कम उम्र के बच्चों के मस्तिष्क में ऐसी बातें डालने को लेकर देश भर के जजों और वकीलों ने चिंता जताई थी. इसे देखते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत ने मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था. उन्होंने गुरुवार, 26 फरवरी को मामला अपनी अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच में सुनवाई के लिए लगाया. बेंच के दूसरे 2 सदस्य थे - जस्टिस जोयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली.

मामले की सुनवाई से पहले ही NCERT ने एक प्रेस रिलीज जारी कर दिया. NCERT ने अपनी गलती पर खेद जताते हुए किताब को वापस लेने की बात कही. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होते ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात की जानकारी बेंच को दी, लेकिन जज इससे संतुष्ट नहीं हुए. चीफ जस्टिस ने कहा कि उन्होंने मामले पर संज्ञान लेने से पहले सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेट्री जनरल को मामले की जानकारी लेने को कहा था. सेकेट्री जनरल ने NCERT के निदेशक को चिट्ठी लिखी. इसके जवाब में निदेशक ने विवादित अध्याय को सही ठहराया.

चीफ जस्टिस ने कहा, 'NCERT की तरफ से अब उठाया गया कदम अपर्याप्त है. यह साफ लगता है कि किताब में जो विवादित अंश है, उसे सोच-समझ कर कर रखा गया था. हम यह जानना चाहते हैं कि इसके पीछे कौन लोग हैं. अभी यह सुनवाई बंद नहीं की जाएगी.' इसके बाद उन्होंने कहा, 'कम आयु के बच्चों को नकारात्मक बातें पहुंचाना गलत है. बच्चों के बाद यह शिक्षकों, अभिभावकों और पूरे समाज तक जाएगी.'

कोर्ट ने साफ किया कि वह स्वस्थ आलोचना की समर्थक है, लेकिन गलत मंशा से की गई बातों से न्यायपालिका के सम्मान को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. चीफ जस्टिस ने कहा, 'अगर यह बातें जान-बूझकर लिखी गई हैं तो यह आपराधिक अवमानना का मामला है. हम NCERT निदेशक और स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को नोटिस जारी कर रहे हैं. मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी.'

सुनवाई के दौरान बेंच के सदस्य जस्टिस बागची ने कहा कि सिर्फ छपी हुई किताबों का वितरण रोक देना काफी नहीं है. यह किताब पीडीएफ फॉर्मेट में ऑनलाइन उपलब्ध है. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि उन्होंने खुद पीडीएफ फॉर्मेट में इस किताब को देखा है. उसमें इतनी गलत बातें लिखी गई हैं, जिन्हें वह आदेश में दर्ज भी नहीं करवाना चाहते. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि हर वेबसाइट से किताब की पीडीएफ फाइल को हटवा दिया जाएगा.

इसके बाद कोर्ट ने आदेश दर्ज करवाते हुए कहा कि किताब को जब्त कर लोगों की पहुंच से हटाया जाए. ऑनलाइन उपलब्ध पीडीएफ को भी हटाया जाए. जिन स्कूलों में किताब पहुंची है उनके प्रिंसिपल भी इसे विभाग को लौटाएं.

किताब का विवादित अंश लिखने वालों की मंशा पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि इसमें न्यायपालिका से जुड़ी तमाम सकारात्मक बातों की उपेक्षा की गई है. लोगों के अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका की बड़ी भूमिका का उल्लेख नहीं किया गया. यह भी नहीं बताया गया कि लोगों को कानूनी सहायता देने और न्याय पाने में सहूलियत के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं. न ही इन बातों का जिक्र है कि सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जीवन मे भ्रष्टाचार के खिलाफ कई अहम आदेश पारित किए हैं. कम उम्र के बच्चों नकारात्मकता और न्यायपालिका के प्रति असम्मान फैलाने को सही नहीं कहा जा सकता.

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