लखनऊ। भूमि स्वामियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण किसान के हक में फैसला सुनाया स न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने रिट-सी संख्या 412ध्2026, बल केश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य में यह आदेश पारित करते हुए ग्राम निजामपुर मंझगांव, तहसील सरोजिनी नगर, जिला लखनऊ निवासी याची श्री बल केश की याचिका को स्वीकार किया।मामला उस आदेश से जुड़ा था, जो 19 मई 2025 को अपर जिलाधिकारी (प्रशासन), लखनऊ द्वारा पारित किया गया था। इस आदेश में राजस्व अभिलेखों में यह दर्ज करने का निर्देश दिया गया था कि याची की भूमि को मैसर्स अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (अंसल एपीआई) ने 18 जनवरी 2019 की बंधक विलेख के माध्यम से एलडीए के पक्ष में गिरवी रखा है।न्यायालय ने 4 मई 2012 के कंसोर्टियम समझौते का परीक्षण करते हुए पाया कि समझौते के तहत भूमि का स्वामित्व अंसल एपीआई को हस्तांतरित नहीं किया गया था।डेवलपर को केवल परियोजना के लिए धन जुटाने हेतु वित्तीय संस्थानों या बैंकों के पक्ष में ही बंधक बनाने की अनुमति थी।एलडीए न तो वित्तीय संस्था है और न बैंक, इसलिए उसके पक्ष में किया गया बंधक समझौते की सीमा से बाहर और अवैध है।अदालत ने यह भी कहा कि यह बंधक अंसल एपीआई की एलडीए के प्रति दायित्वों की पूर्ति की सुरक्षा के रूप में बनाया गया था, जिसकी अनुमति कंसोर्टियम समझौता नहीं देता।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी महत्वपूर्ण रहा कि याची अनुसूचित जाति से संबंधित है। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धाराओं 98 और 104 का उल्लेख करते हुए कहा कि जिलाधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना अनुसूचित जाति के व्यक्ति की भूमि का हस्तांतरण या बंधक शून्य माना जाएगा। इस मामले में ऐसी कोई अनुमति नहीं ली गई थी।हाईकोर्ट ने माना किअंसल एपीआई को याची की भूमि एलडीए के पक्ष में बंधक रखने का कोई अधिकार नहीं थायबंधक विलेख याची के स्वामित्व अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा स राजस्व अभिलेखों में बंधक दर्ज करने का आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं है।इसी आधार पर अदालत ने 19.05.2025 के आदेश को निरस्त करते हुए उसे याची की भूमि, गाटा संख्या 87, 88 सा और 88 मिंजुमला, ग्राम निजामपुर मंझगांव, जिला लखनऊ के संबंध में रद्द कर दिया।कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसलाभूमि मालिकों के अधिकारों को मजबूती देता है,कंसोर्टियम समझौतों की सीमाओं को स्पष्ट करता है,अनधिकृत बंधककरण पर रोक को पुष्ट करता है,
और अनुसूचित जाति के भू-स्वामियों को प्राप्त विशेष कानूनी सुरक्षा को दोहराता है।यह निर्णय उत्तर प्रदेश में चल रही पीपीपी और डेवलपर आधारित परियोजनाओं पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
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