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डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! अकाउंट से 50 लाख निकल गए और आपने अलर्ट भी नहीं किया?


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (9 फरवरी, 2026) को डिजिटल अरेस्ट के मामलों को लेकर चिंता जताई और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए वह एसओपी तैयार करे. कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के जरिए 52 हजार करोड़ रुपये का गबन पूरी तरह से लूट और डकैती है. यह धनराशि कई छोटे राज्यों के बजट से भी ज्यादा है. उन्होंने केंद्र सरकार से कहा कि वह ऐसे मामलों से निपटने के लिए आरबीआई, बैंकों और दूरसंचार विभाग के साथ चर्चा करके एसओपी तैयार करे, ताकि इस पर लगाम लगे. कोर्ट ने बैंकों को भी फटकार लगाई है कि अगर किसी के अकाउंट से बड़ी ट्रांजेक्शन हुई है तो एआई से चलने वाले उपकरणों ने इसे संदिग्ध मानकर उसे अलर्ट क्यों नहीं किया.

रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने कहा कि साइबर धोखाधड़ी को रोकने में बैंकों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. बैंकों की जिम्मेदारी है कि अगर किसी अकाउंट से बड़ी रकम निकाली जाती है और उस अकाउंट से अक्सर छोटी ट्रांसजेक्शंस ही होती हैं, तो तुरंत अकाउंटर होल्डर को अलर्ट करें.

कोर्ट ने कहा कि अगर 10 हजार या 20 हजार रुपये की राशि निकालने वाला कोई रिटायर्ड कर्मचारी अचानक बहुत बड़ी रकम निकालता है, तो बैंक को तुरंत अलर्ट जारी करना चाहिए. कोर्ट ने कहा, 'अगर करोड़ों रुपये का लेनदेन करने वाली कोई कारोबारी संस्था है, तो उस पर संदेह नहीं हो सकता, लेकिन अगर आमतौर पर 15,000 से 20,000 रुपये निकालने वाले पेंशनभोगी के खाते से अचानक 50 लाख, 70 लाख या एक करोड़ रुपये निकाले जा रहे हैं, तो बैंक के एआई से चलने वाले उपकरणों ने इसे संदिग्ध मानकर उसे अलर्ट क्यों नहीं किया?'

कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराध बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या उनकी लापरवाही के कारण हो सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई और बैंकों की ओर से समय पर कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया. अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस मुद्दे पर विचार करेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के शिकार लोगों को मुआवजा देने के मामलों में एक व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है. सुनवाई की शुरुआत में, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कोर्ट को बताया कि आरबीआई ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए बैंकों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का मसौदा तैयार किया है, जिसमें साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए अकाउंट्स पर अस्थाई डेबिट होल्ड लगाए जाने जैसी कार्रवाई समेत कई प्रावधान हैं.

कोर्ट ने कई नए निर्देश जारी करते हुए गृह मंत्रालय से कहा कि वह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की एसओपी पर विचार करे और देशभर में लागू करने के लिए निर्देश जारी करे. एमिकस क्यूरी के तौर पर पेश हुईं सीनियर एडवोकेट एन. एस. नप्पिनई ने कहा कि बैंकों को संदिग्ध लेनदेन के बारे में ग्राहकों के लिए अलर्ट जारी करने के निर्देश दिए जाने चाहिए और इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'समस्या यह है कि बैंक ज्यादातर व्यवसायिक मोड में काम कर रहे हैं और यह स्वाभाविक भी है, लेकिन ऐसा करते हुए वे या तो अनजाने में या मिलीभगत से ऐसे प्लेटफॉर्म बनते जा रहे हैं, जिनके जरिए अपराध से अर्जित धन का तेज और निर्बाध लेनदेन हो रहा है.' जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में ही यह दर्शाया गया है कि अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच साइबर धोखाधड़ी के जरिये 52,000 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी की गई है.

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, 'ये बैंक अब एक बोझ बनते जा रहे हैं. बैंकों को यह समझना चाहिए कि वे धन के रखवाले हैं और उन्हें इसके प्रति अति-उत्साहित नहीं होना चाहिए. उस भरोसे को नहीं तोड़ा जाना चाहिए. समस्या यह है कि ये बैंक ऐसे धोखेबाजों को ऋण भी देते हैं और फिर एनसीएलटी, एनसीएलएटी जैसी संस्थाएं सामने आती हैं, जब धोखाधड़ी करने वाली कंपनियां दिवालिया कार्यवाहियों में उलझ जाती हैं.' कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल की उस दलील पर यह टिप्पणी की, जिसमें उसे बताया गया कि आरबीआई की ओर से लागू किए गए उपायों के दौरान ‘म्यूल’ बैंक खातों का पता चला है

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