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सकट चौथ पर पढ़ी जाने वाली देवरानी-जेठानी की कहानी


सकट चौथ संतान के लिए किया जाने वाला एक प्रमुख व्रत है जो हर साल माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस साल ये व्रत 6 जनवरी को रखा जाएगा। इस व्रत को अधिकतर महिलाएं निर्जला रखती हैं और तारों या चांद को देखकर अपना व्रत खोलती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु और सुखी जीवन की प्राप्ति होती है। इस व्रत में कथा पढ़ना बेहद जरूरी माना जाता है और यहां हम आपको बताएंगे सकट चौथ की देवरानी-जेठानी वाली कथा।

एक नगर में देवरानी जेठानी रहती थी। देवरानी गरीब थी और जेठानी अमीर। देवरानी भगवान गणेश की बड़ी भक्त थी। देवरानी का बिमार पति लकड़ी काट कर उसे बेचा करता था। देवरानी अपनी जेठानी के घर का सारा काम किया करती थी और बदले में जेठानी उसे बचा हुआ खाना और पुराने कपड़े दिया करती थी। एक सम. माघ महीने में देवरानी ने तिल चौथ का व्रत किया। उसने 5 रूपये का तिल व गुड़ लाकर तिलकुट बनाया। उसने सच्चे मन से गणेश भगवान की पूजा की और तिल चौथ की कथा सुनी और तिलकुट्टा छींके में रख दिया। उसने सोचा की चांद निकलने के बाद ही कुछ खायेगी। इसके बाद वो जेठानी के घर काम करने के लिए चली गई। देवरानी ने खाना बनाकर जेठानी के बच्चों को खाना खाने के लिए कहा लेकिन बच्चों ने खाना खाने से मना कर दिया। वो कहने लगे कि मां ने व्रत किया हैं और मां भूखी हैं। इसलिए जब मां खाना खाएंगी तब ही हम भी खाएंगे।

जब उसने जेठजी को खाना खाने को कहा तो जेठजी बोले मैं अकेला नहीं खाऊंगा, चांद निकल जाए उसके बाद ही अपनी पत्नी संग खाऊंगा। देवरानी ने कहा - मुझे घर जाना है इसलिए मुझे खाना दे दो। जेठानी ने कहा कि अभी तक किसी ने खाना नहीं खाया तो तुझे कैसे दे दूं? तुम सुबह ही बचा हुआ खाना ले जाना। देवरानी उदास होकर अपने घर वापस लौट आई। घर पर उसका पति , बच्चे सब आस लगाकर बैठे थे कि त्योहार पर कुछ अच्छा खाने को मिलेगा। परन्तु जब बच्चों को पता चला कि आज कुछ भी खाने को नहीं मिला है तो वो रोने लगे।

ये देखकर देवरानी के पति को गुस्सा आ गया और कहने लगा कि दिन भर काम करने के बाद भी तुम दो रोटियां तक नहीं ला सकती। पति ने गुस्से में आकर पत्नी को कपड़े धोने के धोवने से खूब पीटा। धोवना हाथ से छूट गया तो पाटे से मारा। वो बेचारी रोते हुए सो गई। उस दिन गणेश जी उसके सपने में आकर कहने लगे हे धोवने मारी, पाटे मारी, सो रही है या जाग रही है। गणेश जी बोले भूख लगी है तो खाने के लिए कुछ दे दो।

देवरानी बोली मेरे यहां तो खाने में कुछ भी नहीं है मेरी जेठानी बचा हुआ खाना देती है और आज वो भी नहीं मिला। फिर देवरानी ने कहा कि पूजा का बचा हुआ तिलकुटा छींके में पड़ा हैं, वही खा लो। गणेश जी तिलकुट खाने के बाद बोले - धोवने मारी, पाटे मारी, निमटाई लगी है कहां निमटे। देवरानी ने कहा इस खाली झोपड़ी में आप कहीं भी निमट लो। फिर गणेश जी बोले - अब हाथ कहां पोंछू? तब देवरानी को गुस्सा आ गया और कहने लगी "मेरे सिर पर पोंछो और कहां" देवरानी जब सुबह उठी तो उसने देखा कि उसका पूरा घर हीरों और मोतियों से जगमगा उठा है। सिर पर जहां विनायक जी पोछनी कर गये थे वहां हीरे के टीके और बिंदी जगमगा रही थी।

इसके बाद देवरानी जेठानी के यहां काम करने नहीं गई। जब देवरानी नहीं आई तो जेठानी ने अपने बच्चों को देवरानी को बुलाने भेजा। बच्चे ने जाकर बोला चाची चलो। आपको मां ने बुलाया है। देवरानी ने कहा 'बेटा बहुत दिन तेरी मां के यहां काम कर लिया, अब तुम अपनी मां को ही मेरे यहां काम करने भेज दो'। बच्चो ने जाकर अपनी मां को बताया कि चाची का पूरा घर हीरों-मोतियों से जगमगा रहा है। जेठानी तुरंत देवरानी के घर पहुंची और उससे पूछने लगी कि यह सब कैसे हो गया?

तब देवरानी ने जेठानी को सब बता दिया। घर लौटकर जेठानी ने सोना कि अगर मैं भी देवरानी की तरह करूंगी तो मुझे भी ये सब मिल जाएगा। ये सोचकर वो अपने पति से कहने लगी। आप मुझे धोवने और पाटे से मारो। उसका पति बोला मैंने कभी तुम पर हाथ नहीं उठाया तो अब मैं तुम्हे धोवने और पाटे से कैसे मारूं। वो नहीं मानी और उसने पति को सब समझा दिया। मजबूरन पति को उसे मारना पड़ा। मार खाने के बाद, उसने ढ़ेर सारा घी डालकर चूरमा बनाया और छीकें में रखकर सो गयी। रात में बिंदायक जी उसके सपने में आए और कहने लगे कि भूख लगी है "मैं क्या खाऊं", जेठानी ने कहा - आपने मेरी देवरानी के घर पर एक चुटकी सूखा तिलकुट खाया था। मैने तो घी का चूरमा बनाया है और आपके लिए छींके में रखा हैं। इतना ही नहीं साथ में फल और मेवे भी रखे है जो चाहें खा लो"।

गणेश जी बोले- अब निपटे कहां तब जेठानी बोली उसके यहां एक टूटी हुई झोंपड़ी थी, मेरे यहां एक उत्तम दर्जे का महल है। आप जहां चाहो वहां निपटो। फिर गणेश जी ने पूछा अब हाथ कहां पोंछू तब वो बोली मेरे ललाट पर बड़ी सी बिंदी लगाकर पोंछ लो। लालची जेठानी जब सुबह उठी तो उसने सोचा कि उसका घर भी हीरे-जवाहारात से भर चुका होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि उसका घर बदबू से भर गया उसके सिर पर भी बहुत सारी गंदगी लगी हुई थी।

ये देखकर जेठानी गणेश जी से बोली ये आपने क्या किया, मुझसे रूठे और देवरानी पर टूटे। जेठानी ने घर की सफाई करने की बहुत कोशिश की लेकिन गंदगी और ज्यादा बढ़ती चली गई। तब जेठानी के पति को इस बात का मालूम चला तो वो गुस्से में बोला तेरे पास इतना सब कुछ था फिर भी तेरा मन नहीं भरा। तब जेठानी को अपनी गलती समझ आई और वो गणेश भगवान से विनती करते हुए बोली – मुझसे बड़ी भूल हुई है। मुझे क्षमा कर दो भगवान। तब गणेश जी यानी बिंदायक जी ने कहा देवरानी से जलन के कारण जो तुने किया है उसी का फल तुझे मिला है। अब तू अपने धन में से आधा उसे देगी तभी तेरे घर की ये गंदगी साफ होगी।

इसके बाद जेठानी ने अपनी देवरानी को आधा धन दे दिया किन्तु उसने मोहरों की एक हांडी चूल्हे के नीचे गाढ़ रखी थी। उसने सोचा कि इस बारे में किसी को क्या पता चलेगा और उसने उस धन को नहीं बांटा। जेठानी ने गणेश जी से कहा हे चौथ बिंदायक जी, अब तो ये बिखराव समेटो। वे बोले पहले चूल्हे के नीचे गाढ़ी हुयी मोहरो की हांडी और ताक में रखी सुई की भी पांति कर तभी ये सब सही होगा। इस प्रकार बिंदायकजी ने सुई जैसी छोटी चीज का भी बंटवारा करवाकर अपनी माया समेटी।

हे गणेश जी महाराज, जिस तरह से आपने देवरानी पर कृपा की वैसी ही सब पर करना। साथ ही कहानी कहने और सुनने वालों पर अपनी कृपा करना। किन्तु जेठानी को जैसी सजा दी वैसी किसी को नहीं देना। बोलो गणेश महाराज की जय!

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